न्यायिक सुधार: न्याय की गति, गुणवत्ता और पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम
संसद के वर्तमान सत्र में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश संख्या संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया गया है। इसके तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़कर 37 हो जाएगी। इस प्रकार मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी।
न्यायाधीशों की
संख्या में यह वृद्धि केवल नए पद सृजित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे देश की न्यायिक व्यवस्था को
अधिक तेज, प्रभावी और सुलभ बनाने की दिशा में एक
महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य सर्वोच्च
न्यायालय में लगातार बढ़ते लंबित मामलों के बोझ को कम करना है। आज सर्वोच्च
न्यायालय में लगभग 92,000 मामले लंबित हैं। न्यायाधीशों की सीमित
संख्या के कारण प्रतिदिन सीमित मामलों की ही सुनवाई हो पाती है और अनेक महत्वपूर्ण
मुकदमों, अपीलों तथा याचिकाओं को सूचीबद्ध होने और
सुनवाई के लिए महीनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
चार अतिरिक्त
न्यायाधीशों की नियुक्ति से अधिक संख्या में पीठों का गठन संभव होगा और प्रतिदिन
अधिक मामलों की सुनवाई की जा सकेगी। इसका सीधा प्रभाव लंबित मामलों के निस्तारण की
गति पर पड़ेगा। विशेष रूप से संविधान पीठों के गठन में भी इससे सुविधा होगी।
देश के सामने अनेक
ऐसे राष्ट्रीय, सार्वजनिक और संवैधानिक महत्व के प्रश्न
होते हैं, जिन पर पांच, सात अथवा नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ
द्वारा विचार किया जाना आवश्यक होता है। लेकिन न्यायाधीशों की सीमित संख्या के
कारण ऐसी पीठों का गठन कई बार कठिन हो जाता है और महत्वपूर्ण मामले लंबे समय तक
निर्णय की प्रतीक्षा करते रहते हैं। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से संविधान पीठों
के गठन में अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन आएगा। इससे संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों पर
समयबद्ध निर्णय संभव होंगे तथा कानून की व्याख्या में स्पष्टता आएगी। इसका लाभ
न्यायपालिका के साथ-साथ विधायिका, कार्यपालिका और आम
नागरिकों को भी मिलेगा।
राज्यों की न्याय व्यवस्था पर भी पड़ेगा प्रभाव
सर्वोच्च न्यायालय
में लंबित मामलों का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों
और याचिकाओं से संबंधित होता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल सहित अनेक राज्यों में बड़ी
संख्या में मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। इन मामलों में उच्च न्यायालयों के निर्णय
के विरुद्ध अपील, विशेष अनुमति याचिका तथा अन्य कानूनी
प्रक्रियाओं के माध्यम से मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचते हैं।
जब किसी मामले का
अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय में लंबित रहता है, तो उसका प्रभाव केवल संबंधित पक्षकारों तक सीमित नहीं रहता।
कई बार राज्य सरकारों, प्रशासनिक विभागों, संस्थानों और अन्य प्राधिकरणों को भी
अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। परिणामस्वरूप न्यायिक देरी का प्रभाव
प्रशासनिक और सामाजिक निर्णयों पर भी पड़ता है।
सर्वोच्च न्यायालय
में मामलों के शीघ्र निस्तारण से इस पूरी प्रक्रिया में गति आ सकती है। उच्च
न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध दायर अपीलों का समयबद्ध निपटारा होने पर
राज्यों में भी न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी। अंततः इसका
सबसे बड़ा लाभ आम नागरिक को मिलेगा, जिसे न्याय प्राप्त करने में लगने वाला समय, धन और मानसिक परेशानी कम हो सकती है।
संपत्ति विवाद, तलाक और पारिवारिक विवाद, आपराधिक मामले, सेवा संबंधी मुकदमे, आर्थिक विवाद, संविदा और अनुबंध से जुड़े मामले तथा
मौलिक अधिकारों से संबंधित याचिकाएं लंबे समय तक लंबित रहने के बजाय अपेक्षाकृत
समयबद्ध तरीके से निपटाई जा सकेंगी। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए यह
परिवर्तन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
न्याय में देरी का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिक पर
हमारे देश में
बड़ी संख्या में लोग वर्षों तक अदालतों और कचहरियों के चक्कर लगाते रहते हैं।
मुकदमे की लंबी अवधि केवल आर्थिक बोझ ही नहीं बढ़ाती, बल्कि व्यक्ति और उसके परिवार पर मानसिक
दबाव भी डालती है। बार-बार अदालत में तारीख पर उपस्थित होना, यात्रा करना, वकीलों की फीस देना और वर्षों तक
अनिश्चितता में रहना आम नागरिक के लिए अत्यंत कठिन होता है।
यदि न्यायिक
प्रक्रिया में गति आती है तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा। न्याय केवल होना ही पर्याप्त नहीं है; न्याय समय पर होना भी उतना ही आवश्यक है।
तेज, सस्ता, सुलभ और विश्वसनीय न्याय ही वास्तव में न्याय व्यवस्था में
आम नागरिक का विश्वास मजबूत कर सकता है।
आर्थिक विकास के लिए भी जरूरी है त्वरित न्याय
न्यायिक सुधार का
प्रभाव केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था से
भी है। व्यापारिक विवाद, अनुबंध और ठेकों से जुड़े मामले, निवेश संबंधी विवाद तथा संपत्ति और
वाणिज्यिक मामलों का लंबे समय तक लंबित रहना निवेशकों और उद्योगों के लिए
अनिश्चितता पैदा करता है।
जब कंपनियों और
उद्योगपतियों को यह विश्वास होगा कि विवादों का निस्तारण शीघ्र और निष्पक्ष तरीके
से होगा, तो वे अधिक आत्मविश्वास के साथ निवेश और
व्यावसायिक निर्णय ले सकेंगे। इससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, निवेश बढ़ सकता है और रोजगार के नए अवसर
पैदा हो सकते हैं। इसलिए न्यायिक सुधार को केवल कानूनी सुधार न मानकर आर्थिक सुधार
का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए।
सुधार केवल सर्वोच्च न्यायालय तक सीमित न रहे
हालांकि सर्वोच्च
न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना स्वागत योग्य कदम है, लेकिन न्यायिक सुधार की वास्तविक सफलता तभी
संभव होगी जब यह सुधार न्याय व्यवस्था के सभी स्तरों पर एक साथ किया जाए।
देश के अधीनस्थ
न्यायालयों में न्यायाधीशों और न्यायिक कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता
है। रिक्त पदों को लंबे समय तक खाली रखना न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर बाधा है।
उच्च न्यायालयों में भी रिक्त पदों को शीघ्र भरने की व्यवस्था होनी चाहिए। न्यायिक
नियुक्तियों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और संस्थागत बनाने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
योग्य और
प्रतिभाशाली युवाओं को न्यायिक सेवा में आकर्षित करने के लिए बेहतर करियर संरचना, प्रशिक्षण और कार्य परिस्थितियां उपलब्ध
करानी होंगी। योग्य न्यायिक अधिकारियों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित किए बिना
केवल सर्वोच्च न्यायालय में कुछ अतिरिक्त पद बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान
नहीं होगा।
यदि निचली अदालतों
और उच्च न्यायालयों में मामलों का समय पर निस्तारण होगा तो सर्वोच्च न्यायालय में
अपीलों का दबाव भी कम होगा। इससे सर्वोच्च न्यायालय अपना अधिक समय और ऊर्जा
राष्ट्रीय, सार्वजनिक और संवैधानिक महत्व के मामलों
पर केंद्रित कर सकेगा।
तकनीक के साथ बदले न्यायालयों का कामकाज
न्यायिक सुधार का
अगला महत्वपूर्ण क्षेत्र तकनीक है। ई-फाइलिंग, डिजिटल केस मैनेजमेंट, ऑनलाइन और वर्चुअल सुनवाई, बेहतर केस रजिस्ट्रेशन तथा मामलों की डिजिटल ट्रैकिंग जैसी
व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए।
विशेष रूप से
दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले पक्षकारों, अधिवक्ताओं और न्यायालय कर्मचारियों के लिए डिजिटल सुविधाएं
काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। हर मामले की स्थिति, अगली सुनवाई की तारीख और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी
ऑनलाइन उपलब्ध होने से पारदर्शिता बढ़ेगी और अनावश्यक भागदौड़ कम होगी।
लेकिन तकनीक अपने
आप न्यायिक व्यवस्था को प्रभावी नहीं बना सकती। इसके लिए पर्याप्त न्यायालय भवन, आधुनिक बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षित कर्मचारी, सक्षम न्यायाधीश और कुशल प्रशासनिक
व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक हैं।
छुट्टियों, स्थगन और हड़ताल की संस्कृति पर भी विचार जरूरी
न्यायाधीशों की
संख्या बढ़ाने के साथ-साथ न्यायालयों के कार्यदिवस और कार्य-घंटों को भी आवश्यकता
के अनुसार अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। न्यायिक अवकाश और वेकेशन की वर्तमान
व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा की जा सकती है, ताकि लंबित मामलों के निस्तारण के लिए पर्याप्त कार्यदिवस
उपलब्ध हों।
इसी प्रकार
अनावश्यक स्थगन अर्थात adjournment की प्रवृत्ति पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। बार और
अधिवक्ताओं की हड़तालों के कारण न्यायिक कार्य प्रभावित न हो, इसके लिए भी संस्थागत व्यवस्था विकसित की
जानी चाहिए। किसी पक्ष को बार-बार तारीख देकर मुकदमे को अनिश्चितकाल तक खींचने की
अनुमति नहीं होनी चाहिए।
न्यायालयों द्वारा
दिए गए स्थगन आदेश (stay orders) की भी समय-समय पर समीक्षा और उनके लिए
स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। लंबे समय तक
प्रभावी रहने वाले स्थगन आदेश कई बार पूरे विवाद को ही अनिश्चितकाल के लिए रोक
देते हैं।
संख्या बढ़ाने के साथ गुणवत्ता भी जरूरी
न्यायाधीशों की
संख्या बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन केवल संख्या बढ़ा देना पर्याप्त
नहीं होगा। न्यायिक व्यवस्था को सक्षम, स्वतंत्र, निष्पक्ष, जवाबदेह और तकनीकी रूप से आधुनिक बनाना
भी उतना ही जरूरी है। योग्य, समर्पित और मेहनती
न्यायाधीशों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति, निरंतर प्रशिक्षण और बेहतर कार्य वातावरण पर भी ध्यान देना
होगा।
न्याय व्यवस्था की
सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने मामले निपटाए गए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि कितनी तेजी, गुणवत्ता, निष्पक्षता और कानूनी स्पष्टता के साथ उनका निस्तारण हुआ।
न्यायिक सुधार समय की मांग
सर्वोच्च न्यायालय
में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का निर्णय निश्चित रूप से स्वागत योग्य पहल है।
लेकिन यह सुधार तभी वास्तविक परिवर्तन में बदल सकता है जब इसके साथ निचली अदालतों
से लेकर उच्च न्यायालयों तक व्यापक सुधार किए जाएं।
न्याय में देरी
केवल न्यायपालिका की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव व्यक्ति, परिवार, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और पूरे समाज पर पड़ता है।
इसलिए न्यायिक सुधार को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखने की आवश्यकता है।
एक ऐसी न्याय
व्यवस्था, जहां मुकदमों का निस्तारण समयबद्ध हो, न्याय सस्ता और सुलभ हो, अनावश्यक स्थगन पर रोक हो, तकनीक का व्यापक उपयोग हो, न्यायाधीशों और कर्मचारियों की पर्याप्त
संख्या हो तथा नागरिकों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें—वही लोकतंत्र में कानून के शासन को वास्तविक अर्थ प्रदान कर
सकती है।
न्याय केवल मिलना
नहीं चाहिए, न्याय समय पर मिलना चाहिए। यही किसी भी
सभ्य, लोकतांत्रिक और विकसित समाज की पहचान है।


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