जज साहिबा की डॉक्टरेट
जज साहिबा की डॉक्टरेट
प्रस्तवना
पिछले कुछ दिनों से शिक्षा जगत से जुड़े समाचारों में मुख्यतः भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और निराशाजनक घटनाओं की ही चर्चा देखने को मिल रही है। ऐसे समाचारों का लाखों विद्यार्थियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि शिक्षा को समाज में आशा, प्रगति और नैतिक मूल्यों के आधार के रूप में देखा जाता है। जब परीक्षा प्रणाली, नियुक्तियों, प्रवेश प्रक्रियाओं, और शैक्षणिक संस्थानों में भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं, तो छात्रों का विश्वास शिक्षा व्यवस्था से डगमगाने लगता है। वे अपने परिश्रम और प्रतिभा के भविष्य को लेकर चिंतित एवं हताश महसूस करने लगते हैं।
वर्तमान समय में स्थिति यह हो गई है कि अनेक स्थानों पर शिक्षाविदों की अपेक्षा तथाकथित "शिक्षा माफिया" अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगे हैं। शिक्षा को सेवा और ज्ञान के क्षेत्र के बजाय लाभ कमाने के साधन के रूप में देखा जाने लगा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि गुणवत्ता, नैतिकता और शैक्षणिक उत्कृष्टता जैसे मूलभूत मूल्य लगातार कमजोर पड़ रहे हैं।
इसी प्रकार शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र की स्थिति भी चिंताजनक होती जा रही है। शोध, जिसका उद्देश्य नए ज्ञान का सृजन और समाज की समस्याओं का समाधान खोजना होता है, आज कई स्थानों पर अनैतिक प्रवृत्तियों का शिकार हो रहा है। अनेक शोध कार्य कॉपी-पेस्ट, साहित्यिक चोरी (प्लेज़रिज़्म), डेटा की हेराफेरी, दूसरों के कार्य की नकल तथा व्यक्तिगत संबंधों और प्रभाव के आधार पर पूरे किए जा रहे हैं। कुछ मामलों में शोध की गुणवत्ता की बजाय केवल डिग्री प्राप्त करना ही मुख्य उद्देश्य बन गया है। इससे न केवल अनुसंधान की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि ज्ञान के विकास की प्रक्रिया भी बाधित होती है।
यदि इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो शिक्षा और शोध दोनों क्षेत्रों की साख को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। इसलिए आवश्यक है कि पारदर्शिता, जवाबदेही, नैतिक मूल्यों, और कठोर गुणवत्ता मानकों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि शिक्षा और अनुसंधान की गरिमा तथा विश्वसनीयता को पुनः स्थापित किया जा सके।
इस गोरखधंधे में केवल कुछ ही लोग नहीं, बल्कि शिक्षा और अनुसंधान के पूरे तंत्र के विभिन्न स्तरीय प्रतिनिधि लिप्त पाए जा रहे हैं। इसमें शोधार्थी, शिक्षक, विश्वविद्यालय प्रशासन, परीक्षक, अभिभावक और अन्य सम्बद्ध अधिकारी सभी शामिल हैं। यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि या कमजोरी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि एक व्यवस्थित प्रवृत्ति बन चुकी है। शोधार्थी कभी-कभी अपने व्यक्तिगत लाभ और डिग्री प्राप्ति के लिए अनैतिक रास्ते अपनाते हैं, वहीं शिक्षक और प्रशासक इन गतिविधियों में सीधे या परोक्ष रूप से सहायक बन जाते हैं।
इतना ही नहीं, उच्च स्तरीय नौकरशाह, राजनेता, न्यायाधीश और उद्योगपति भी इस प्रक्रिया में बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं, विशेषकर तब जब शोधार्थी उनके परिवार का सदस्य होता है। इस प्रकार सत्ता और प्रभाव का दुरुपयोग शिक्षा और अनुसंधान की निष्पक्षता को प्रभावित करता है। समाज में ऐसी घटनाओं के बढ़ने से यह संदेश जाता है कि ज्ञान और मेहनत की अपेक्षा संबंध और पैसों का महत्व अधिक है।
कई मामलों में शोधार्थी पूरी तरह से अदृश्य लेखकों या पेशेवर लेखन सेवाओं पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसे "भेद्य लेखक" (ghost writer) शोध का पूरा कार्य तैयार कर देते हैं, और शोधार्थी केवल उस पर अपने नाम का छाप लगाकर प्रमाणित कर लेते हैं। इससे न केवल शोध की विश्वसनीयता नष्ट होती है, बल्कि अनुसंधान की प्रक्रिया का मूल उद्देश्य—नवीन ज्ञान का सृजन और समाज में सकारात्मक योगदान—भी धूमिल हो जाता है। यह स्थिति शिक्षा और अनुसंधान की प्रतिष्ठा के लिए गम्भीर खतरा है, और इसके परिणाम स्वरूप आने वाली पीढ़ियों का विश्वास शैक्षणिक प्रणाली में डगमगाने लगता है।
यदि इसी तरह अनैतिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता रहा, तो शिक्षा और अनुसंधान केवल एक दिखावटी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा, जहाँ गुणात्मक मूल्य और नैतिकता की कोई कीमत नहीं होगी। समाज और नीति निर्धारकों के लिए यह समय अत्यंत गंभीर और चिन्ताजनक है कि वे इन अनैतिक प्रथाओं पर तुरंत नियंत्रण और सुधार लागू करें।
शोध के क्षेत्र में व्याप्त इसी गंभीर समस्या को केंद्र में रखकर वर्तमान लघु उपन्यास की रचना की गई है। इस कृति का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि शिक्षा और अनुसंधान जगत में फैल रही अनियमितताओं, नैतिक पतन और भ्रष्टाचार की ओर समाज, शिक्षाविदों तथा नीति-निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करना है। आशा की जाती है कि यह उपन्यास उन लोगों तक अवश्य पहुँचेगा जो शिक्षा व्यवस्था की नीतियाँ और योजनाएँ निर्धारित करते हैं, ताकि वे इस समस्या की वास्तविक गंभीरता को समझ सकें और इसके समाधान की दिशा में सार्थक कदम उठा सकें।
नई शिक्षा नीति में शोध की गुणवत्ता, मौलिकता और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के अनेक प्रावधान किए गए हैं, किंतु शोध में बढ़ते भ्रष्टाचार, साहित्यिक चोरी, डेटा की हेराफेरी, फर्जी शोध लेखन तथा प्रभाव और सिफारिश के आधार पर होने वाली अनियमितताओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए और अधिक ठोस एवं व्यावहारिक उपायों की आवश्यकता है। केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है; उनके कठोर और निष्पक्ष क्रियान्वयन की भी उतनी ही आवश्यकता है। शोध प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी, ताकि अनुसंधान की विश्वसनीयता बनी रहे।
यह भी स्पष्ट है कि यह समस्या इतनी गहराई तक जड़ें जमा चुकी है कि इसका समाधान तुरंत संभव नहीं है। वर्षों से विकसित हुई इस विकृति को समाप्त करने के लिए दीर्घकालिक और सतत प्रयासों की आवश्यकता होगी। दुर्भाग्यवश, अब तक अधिकांश विश्वविद्यालय प्रशासन इस दिशा में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पाए हैं। कई संस्थानों ने इस विषय पर केवल औपचारिक कदम उठाए हैं, जबकि वास्तविक सुधार के लिए आवश्यक कठोर निर्णयों और संरचनात्मक परिवर्तनों से बचते रहे हैं। परिणामस्वरूप, शोध व्यवस्था में व्याप्त कमियाँ लगातार बनी हुई हैं।
वर्तमान परिस्थितियों में आवश्यक है कि विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और नियामक निकाय शोध की मूल भावना, उसके नैतिक सिद्धांतों तथा ज्ञान-सृजन के वास्तविक उद्देश्य को समझें। उन्हें अपने शोध ढाँचे, मूल्यांकन प्रणाली, पर्यवेक्षण प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र में व्यापक सुधार करने होंगे। शोधार्थियों को अनुसंधान नैतिकता का प्रशिक्षण दिया जाए, साहित्यिक चोरी और डेटा हेराफेरी के विरुद्ध कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाएँ तथा शोध कार्यों की नियमित और स्वतंत्र समीक्षा सुनिश्चित की जाए। यदि ऐसे व्यापक और गंभीर प्रयास किए जाते हैं, तो आने वाले वर्षों में उच्च गुणवत्ता, मौलिकता और सामाजिक उपयोगिता वाले शोध कार्यों को बढ़ावा मिलेगा तथा शिक्षा और अनुसंधान की खोई हुई विश्वसनीयता को पुनः स्थापित किया जा सकेगा।
इस लघु उपन्यास लिखने के सलाह और प्रेरणा के लिये, मैं प्रसिद्ध शिक्षविद, लेखक, उपन्यासकार, और आलोचक प्रोफेसर विकास शर्मा, अंग्रेजी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविध्यालय का दिल से आभारी हूँ। उनकी सलाह और प्रोत्साहन के बिना इस लघु उपन्यास का लिखना असम्भव था।
मै मंद्बुधि शोधार्थि श्रीमति पंगु वर्मा, उनके भ्रष्ट पिता, पति और विश्वविध्यालय के भ्रष्ट अधिकारियों का भी दिल से आभारी हूँ जिनके उत्पीणन ने इस लघु उपन्यास के लिखने के लिये विषय वस्तु की रूपरेखा तैयार कराई। अंत मैं अपनी धरमपत्नी श्रीमति अल्पना वर्मा का आभारी हूँ जिन्होंने इस सारी भ्रष्ट मंडली को वर्षों तक झेला और इस लघु उपन्यास के लिये एक रुचिपूर्ण कहानी के लिये समस्त विषयवस्तु तैयार करवाने की भुमिका बनवाई।
प्रोफेसर (रिटा.) योगेश कुमार शर्मा
जज साहिबा की डॉक्टरेट
दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी, चारों ओर फैला अराजक वातावरण तथा प्रतिदिन सुनने को मिलने वाले घोटालों और भ्रष्टाचार के समाचारों ने मेरे मन को अत्यंत व्यथित और अशांत कर दिया था। इन परिस्थितियों से ऊबकर मेरे मन में यह इच्छा जागृत हुई कि कुछ समय के लिए इस भाग-दौड़ और तनावपूर्ण जीवन से दूर किसी शांत एवं शीतल स्थान पर जाकर मानसिक शांति प्राप्त की जाए। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने अचानक हरिद्वार जाने का निश्चय कर लिया। संध्या के समय मैं पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा और वहाँ से हरिद्वार जाने वाली पैसेंजर गाड़ी में सवार होकर अपनी यात्रा आरंभ कर दी।
पैसेंजर गाड़ी से यात्रा करने के अनेक लाभ हैं। सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें यात्रियों की अपेक्षाकृत कम भीड़ होने के कारण बैठने के लिए सीट आसानी से मिल जाती है और यात्रा अपेक्षाकृत आरामदायक बन जाती है। इसके अतिरिक्त, पैसेंजर ट्रेन में सफर करने से भारत के वास्तविक जनजीवन को बहुत निकट से देखने और समझने का अवसर मिलता है। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोग यात्रा करते हैं, जिनमें गरीब, मजदूर, किसान, छोटे व्यापारी तथा सामान्य नागरिक शामिल होते हैं। उनके रहन-सहन, समस्याओं और जीवन-संघर्षों को देखकर भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर सामने आती है।
पैसेंजर गाड़ी की गति अपेक्षाकृत धीमी होती है। वह छोटे-बड़े अनेक स्टेशनों पर रुकती हुई आगे बढ़ती है। इस कारण यात्रियों को रास्ते में पड़ने वाले गाँवों, कस्बों, खेतों, नदियों और प्राकृतिक दृश्यों को देखने का पर्याप्त अवसर मिलता है। ऐसी यात्रा से भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र तथा सामान्य ज्ञान में स्वाभाविक रूप से वृद्धि होती है। विभिन्न स्थानों की संस्कृति, भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है।
मैं स्वयं भी इन्हीं कारणों से पैसेंजर गाड़ी में यात्रा करना पसंद करता हूँ। सीमित आय और साधारण आर्थिक स्थिति वाले लोगों के लिए यह यात्रा का किफायती साधन है। इसका किराया कम होता है, जिससे जेब पर अधिक बोझ नहीं पड़ता। साथ ही, यात्रा के दौरान विभिन्न प्रकार के लोगों से मिलने-जुलने और उनके अनुभवों को जानने का अवसर मिलता है। इस प्रकार पैसेंजर गाड़ी की यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का साधन नहीं रह जाती, बल्कि यह जीवन, समाज और देश को समझने का एक रोचक अनुभव बन जाती है।
ट्रेन को चले हुए अधिक समय नहीं हुआ था, किंतु धीरे-धीरे संध्या का धुंधलका समाप्त होकर रात्रि का अंधकार चारों ओर फैलने लगा। यद्यपि इस दौरान मैंने ट्रेन में कई घंटे व्यतीत किए, फिर भी उसकी धीमी गति के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यात्रा बहुत कम दूरी ही तय कर पाई हो। खिड़की से बाहर दृष्टि डालने पर दिन का उजाला धीरे-धीरे लुप्त होता दिखाई देता था और उसके स्थान पर रात का सन्नाटा तथा अंधकार अपना साम्राज्य स्थापित कर रहे थे।
रात्रि के बढ़ते अंधेरे के बीच दूर-दूर कहीं-कहीं कुछ बल्ब टिमटिमाते हुए दिखाई दे रहे थे। वे बल्ब भी स्थिर प्रकाश देने के बजाय मद्धिम और कांपती हुई रोशनी बिखेर रहे थे। उनकी क्षीण चमक आसपास के घने अंधकार को पूरी तरह दूर करने में असमर्थ प्रतीत होती थी। ट्रेन की खिड़की से दिखाई देने वाले ये दृश्य ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति का चित्र प्रस्तुत कर रहे थे।
उन टिमटिमाते बल्बों को देखकर मन में यह विचार उठ रहा था कि देश में बिजली पहुँचाने के अनेक दावे किए जाते हैं, परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। ऐसा लगता था मानो घर-घर और गाँव-गाँव बिजली पहुँचाने की योजनाएँ सरकारी कागज़ों और फाइलों तक ही सीमित रह गई हों। अनेक गाँव आज भी पर्याप्त बिजली सुविधा से वंचित हैं और जहाँ बिजली पहुँची भी है, वहाँ उसकी स्थिति इतनी कमजोर है कि बल्बों की रोशनी भी संघर्ष करती हुई दिखाई देती है।
इस दृश्य ने विकास संबंधी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट कर दिया। एक ओर आधुनिकता और प्रगति के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण भारत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। रात के अंधेरे में टिमटिमाते वे बल्ब मानो इसी सच्चाई की मौन कहानी कह रहे थे।
वाइल्ड वेस्ट के डर के कारण मैं अपनी सीट पर चुपचाप बैठा था। मेरठ से पहले तक दैनिक यात्रियों के कारण यात्री उतरते ज़्यादा थे, चढ़ते कम थे। आती-जाती लड़कियों, महिलाओं पर सीटी बजाना, फिकरे कसना यहाँ एक राष्ट्रीय पर्व के समान है। सभी देखते हैं, ज़्यादातर करते हैं। शायद थकान और तनाव दूर करने का कोई मुफ्त का लुक़मान हकीम का नुस्ख़ा हो। यहाँ तक कि पुलिस के जवान भी सुनकर अनसुना कर देते हैं। शायद पुरुषों का यह मानव अधिकार है और महिलाओं के नारीत्व का अभिन्न हिस्सा है। वैस्टर्न उत्तर प्रदेश की पैसेंजर ट्रेनों का अपना अलग ही संसार है—एक ऐसा संसार जहाँ यात्रियों से अधिक भय यात्रा करता है।
मेरठ के आसपास के किसी छोटे से स्टेशन पर ट्रेन कुछ देर के लिए रुकी। उसी दौरान अधेड़ आयु का एक दंपति डिब्बे में चढ़ा। उनके चेहरे पर थकान, चिंता और जीवन के लंबे संघर्षों की गहरी छाप स्पष्ट दिखाई दे रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो समय और परिस्थितियों ने उनके चेहरे की सारी ताजगी और चमक छीन ली हो। उनके मुरझाए हुए चेहरे और बुझी हुई आँखें उनकी कठिन जीवन-यात्रा की मौन कहानी सुना रही थीं।
दोनों का शरीर अत्यंत दुबला-पतला था। वे इतने क्षीण दिखाई दे रहे थे कि मानो शरीर पर केवल हड्डियों का ढाँचा ही शेष रह गया हो। उन्हें देखकर लेखक के मन में मक्के के खेतों में खड़े उन बिजूकों (कौआ भगाने वाले पुतलों) की छवि उभर आई, जिन्हें डंडों पर पुराने कपड़े टाँगकर खड़ा कर दिया जाता है। उनकी शारीरिक दशा, गरीबी, अभाव और निरंतर परिश्रम की साक्षी प्रतीत हो रही थी।
ट्रेन में चढ़ने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने थैले और अन्य सामान को सावधानीपूर्वक एक सुरक्षित स्थान पर रखा। उनके हाव-भाव से ऐसा लग रहा था मानो सामान की सुरक्षा उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो, क्योंकि शायद वही उनकी पूरी पूँजी या जीवनभर की मेहनत का सहारा था। सामान व्यवस्थित कर लेने के बाद उनके चेहरों पर धीरे-धीरे कुछ संतोष और शांति के भाव उभरने लगे।
उस क्षण ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे किसी बड़े संकट, भयावह दुर्घटना या प्रचंड सुनामी जैसी विपत्ति से बचकर सुरक्षित स्थान पर पहुँचे हों। ट्रेन में बैठ जाने और सामान को सुरक्षित देख लेने के बाद उनके मन का तनाव कुछ कम हो गया था। उनके चेहरों पर उभरती हल्की-सी राहत इस बात का संकेत दे रही थी कि संघर्षों से भरे जीवन में छोटी-सी सुरक्षा और स्थिरता भी व्यक्ति को कितनी बड़ी शांति प्रदान कर सकती है।
उन्हें देखकर यह अनुभव होता था कि समाज में ऐसे असंख्य लोग हैं जिनका जीवन निरंतर संघर्ष, अभाव और कठिनाइयों के बीच गुजरता है। फिर भी वे हर दिन नई आशा के साथ आगे बढ़ते रहते हैं और छोटी-छोटी राहतों में भी संतोष खोज लेते हैं। यह अधेड़ दंपति उसी जिजीविषा, सहनशीलता और जीवन-संघर्ष का सजीव प्रतीक प्रतीत हो रहा था।
एक पॉलीथिन के थैले में कुछ राख तथा फटे कागज़ देखकर बहुत अजीब लगा कि ये क्या ले जा रहे हैं? क्यों ले जा रहे हैं? कहाँ ले जा रहे हैं? मेरे मन में पॉलीथिन के थैले का रहस्य जानने की जिज्ञासा बेकाबू होती जा रही थी तथा मैं अपने को रोकने में एकदम असमर्थ पा रहा था। अंत में मेरे अंदर की जिज्ञासा ने मेरे धैर्य और झिझक को पीछे छोड़ दिया और मैंने बिना किसी परिचय एवं झिझक के एक द्रोण-प्रक्षेपास्त्र की तरह अपने प्रश्न का गोला फोड़ दिया।
“भाई साहब, इस पॉलीथिन के थैले में क्या ले जा रहे हैं?”
मेरे इस प्रश्न को सुनकर दोनों ने चौंककर एक लंबी दर्दभरी साँस ली। इसके बाद महिला ने प्रश्नभरी आँखों से अपने पति की ओर देखा, जैसे वह कह रही हो—“आप ही कहानी के वाचक बन जाइए।”
पति देव ने फिर एक लंबी साँस ली तथा जिस तरह बेताल पेड़ से उतरकर कहानी सुनाने के लिए राजा विक्रमादित्य के कंधे पर लटक जाता है, ठीक उसी तरह मैं भी उचककर उसकी बगल में जा बैठा।
एक थके-हारे यात्री की तरह वर्मा साहब अर्थात् पतिदेव ने आपबीती सुनानी प्रारम्भ की। वर्मा साहब पेशे से शिक्षक थे तथा उनकी पत्नी श्रीमती अल्पना वर्मा भी कहीं शिक्षिका थीं। दोनों गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र में अंधेर नगरी चौपट राज्य विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में शिक्षक थे। दोआब का क्षेत्र पहले किसान, जवान और दूध के लिए सुप्रसिद्ध था, परन्तु आधुनिक ग्लोबल एवं सेक्युलर भारत में यह क्षेत्र अपराध, अपहरण, पशु-वध, भूमाफिया, शिक्षा माफिया आदि काले धन्धों के लिए कुख्यात हो गया है। ऐसे ही शोध माफिया के चंगुल से सकुशल बच निकलने की खुशी में यह दम्पति तीर्थयात्रा पर जा रहा था।
वर्मा साहब ने आगे बोलना प्रारम्भ किया—
मई माह का समय था। चारों तरफ तपती धूप की गर्मी से धरती बुरी तरह झुलस रही थी। गर्मी को भगाने के लिए मैं अपनी पत्नी अल्पना वर्मा के साथ ठंडी-ठंडी नींबू की शिकंजी का मज़ा ले रहा था कि अचानक मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी। मोबाइल के बजने के साथ हमारे दिलों की धड़कनें भी बढ़ जाती हैं, क्योंकि हम जैसे सीधे-सादे शिक्षकों के मोबाइल बजने का अर्थ होता है कि कोई उनके उत्पीड़न एवं शोषण का षड्यंत्र रच रहा है। नेता, अधिकारी, व्यापारी एवं शिक्षा माफिया तो मोबाइल के बजते ही दीपावली की लक्ष्मी माता के स्वागत की तरह उसे सुनने के लिए लपकते हैं, परन्तु हम लोग एक अनचाहे ख़तरे की आशंका से काँपते हाथों से उसका रिसीविंग बटन दबाते हैं। मई-जून के महीने में शिक्षा माफिया वैसे भी अधिक सक्रिय हो जाते हैं।
फ़ोन रिसीव करने पर उधर से मेरे चार दशक पुराने मित्र डॉ. संजय वर्मा की आवाज़ आई। आवाज़ पहचानते ही कुछ राहत मिली। कुशल-क्षेम के आदान-प्रदान के बाद काम की बात प्रारम्भ हुई। डॉ. संजय वर्मा स्वयं अंग्रेज़ी के एक वरिष्ठ रीडर हैं। उन्होंने बताया कि उनके एक अत्यन्त पुराने परिचित हैं, जो अत्यन्त प्रतिष्ठित शिक्षाविद् हैं। वर्तमान समय में किसी शिक्षाविद् के अस्तित्व की बात सुनकर सहसा कानों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि आज यह एक दुर्लभ प्रजाति हो गई है। अब शिक्षा माफिया और शिक्षा के दलाल ही बहुतायत में मिलते हैं। अंधेर नगरी चौपट राज्य विश्वविद्यालय तो ऐसे दलालों के लिए विशेष रूप से कुख्यात है, जहाँ वे भरे पड़े हैं। उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत से भी डॉ. राधाकृष्णन, प्रोफेसर कोठारी, प्रोफेसर झा, प्रोफेसर देव, प्रोफेसर फ़िराक आदि के साथ यह प्रजाति भी लुप्त होकर दुर्लभ हो गई है।
खैर, वास्तविकता जो भी रही हो, डॉ. संजय वर्मा के मित्र डॉ. डी. एस. वर्मा किसी महाविद्यालय में फिजिक्स के सेवानिवृत्त रीडर थे। बातचीत में वे शिक्षा के रीडर कम और बिजली के मीटर रीडर अधिक लग रहे थे। डींगें मारने में उनका कोई जवाब नहीं था। आते ही हमें ज्ञान हो गया कि वे पी-एच.डी. छपवाने में अर्धशतक बना चुके हैं तथा रिसर्च पेपर छपवाने में शतक पूरा कर चुके हैं। उनके लिए 'छपवाना' शब्द ही अधिक उपयुक्त है, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में शोध कराना तथा शोध-पत्र लिखना लगभग असम्भव है। कोई भी व्यक्ति केवल चोरी और फ़र्ज़ीवाड़े के सहारे ही इतनी बड़ी संख्या तक पहुँच सकता है।
शोध अथवा रिसर्च जगत की सबसे बड़ी और उच्चतम डिग्री और सम्मान है। पर अब शोध में भ्रष्टाचार, अनैतिकता, और बेईमान कार्यों का बोलबाला हो गया है। इससे वैज्ञानिक और शैक्षिक ईमानदारी, शुद्धता, और विश्वास खत्म हो गया है। इसके साथ ही साथ आजकल शोध आंकड़ों, उपकरण, प्रक्रिय और डाटा की हेराफेरी कर, उन्हें शुद्ध और सही होने का दावा और प्रस्तुत किया जाता है। एक नई बीमारी ने आज शोध कार्य को बुरी तरह जकड़ लिया है। दूसरे शोधार्थी के कार्य में से विचार, प्रक्रिया, परिणाम और भाषा की नकल कर ली जाती है और उस श्रोत को कहीं भी उद्धरित और वर्णन नहीं किया जाता है।
शोध में भ्रष्टाचार कई रूपों में सामने आता है, जो न केवल अनुसंधान की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि समाज और वैज्ञानिक समुदाय के लिए भी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न करता है। घोस्टराइटिंग (Ghostwriting) एक ऐसी अनैतिक और भ्रष्ट प्रक्रिया है जिसमें किसी अन्य व्यक्ति से शोध पत्र, लेख या अकादमिक सामग्री लिखवाई जाती है, लेकिन उसे किसी दूसरे लेखक के नाम से प्रकाशित किया जाता है। प्रायः आर्थिक लाभ के बदले यह कार्य किया जाता है।
इसी प्रकार, डेटा का दमन (Suppression of Data) तब होता है जब शोधकर्ता जानबूझकर उन आँकड़ों या तथ्यों को छिपा देते हैं जो अपेक्षित या इच्छित परिणामों के विपरीत हों। यह वैज्ञानिक निष्पक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है। इसके अतिरिक्त, हितों के टकराव का खुलासा न करना (Undisclosed Conflicts of Interest) भी एक गंभीर समस्या है, जिसमें शोधकर्ता अपने व्यक्तिगत, आर्थिक या व्यावसायिक हितों को प्रकट नहीं करते, जबकि वे शोध के परिणामों या उनकी व्याख्या को प्रभावित कर सकते हैं।
लेखकीय श्रेय का अनुचित निर्धारण (Improper Authorship Attribution) भी शोध भ्रष्टाचार का एक रूप है, जिसमें उन व्यक्तियों को लेखक के रूप में शामिल कर लिया जाता है जिन्होंने वास्तविक योगदान नहीं दिया, या उन लोगों को बाहर कर दिया जाता है जिन्होंने शोध कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो।
शोध में भ्रष्टाचार के परिणाम अत्यंत गंभीर और दूरगामी होते हैं। इससे विज्ञान और शैक्षणिक संस्थानों के प्रति जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है। यदि गलत या भ्रामक आँकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाएँ, तो इससे व्यक्तियों और समुदायों को नुकसान पहुँच सकता है, विशेषकर चिकित्सा, औषधि और सामाजिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में, जहाँ शोध के परिणाम सीधे मानव जीवन को प्रभावित करते हैं।
इसके अलावा, ऐसे भ्रष्ट शोध के कारण संसाधनों, समय और धन की भारी बर्बादी होती है, क्योंकि अन्य शोधकर्ता उसी त्रुटिपूर्ण कार्य को आधार बनाकर आगे अनुसंधान करते रहते हैं। साथ ही, इसमें शामिल व्यक्तियों और संस्थानों की प्रतिष्ठा तथा उनके करियर को भी गंभीर क्षति पहुँचती है।
शोध में भ्रष्टाचार की रोकथाम और पहचान के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय अपनाए जा सकते हैं। सबसे पहले, नैतिक दिशानिर्देशों और शोध प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। शोध को प्रकाशित करने से पहले सहकर्मी समीक्षा (Peer Review) प्रक्रिया के माध्यम से उसकी गहन जाँच आवश्यक है, ताकि त्रुटियों और अनियमितताओं का पता लगाया जा सके।
इसके अतिरिक्त, शैक्षणिक और शोध संस्थानों को शोध की सत्यनिष्ठा बनाए रखने तथा कदाचार रोकने के लिए स्पष्ट और कठोर नीतियाँ बनानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोध के क्षेत्र में पारदर्शिता, खुलापन और जवाबदेही की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि वैज्ञानिक अनुसंधान निष्पक्ष, विश्वसनीय और समाज के हित में बना रहे।
इन्हीं भय के कारण हम दोनों शोध गाइड नहीं बनते थे और पूरे कैरियर में किसी को शोध नहीं कराया। पर बचते-बचते भी इस बार महा ठग बंटी और बबली के चक्कर में फंस गये।
बेशर्म डॉ. डी. एस. वर्मा हमारे घर आने के लिए धर्मपत्नी को लफंगे की तरह फ़ोन पर फ़ोन किए जा रहे थे। उनकी इस बेशर्मी और प्रताप को देखकर हम उनसे मिलने में घबरा रहे थे तथा उनके अनेक आग्रहों पर भी हम उनसे मिलने से मना ही करते रहे। मेरी धर्मपत्नी ने तो एकदम मना कर दिया, क्योंकि आज के पी-एच.डी. में अर्धशतक तथा शोध-पत्रों में शतकवीरों से मिलना किसी अंडरवर्ल्ड के माफिया डॉन से मिलने से कम नहीं, बल्कि मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने के समान है।
मिलने से मना करने पर भी डॉ. संजय वर्मा एवं डॉ. डी. एस. वर्मा ने टेलीफ़ोन की झड़ी लगा दी तथा दोनों ने हमारा जीना हराम कर दिया। हारकर धर्मपत्नी जी ने रिसर्च एवं शोध-पत्र शतकवीर डॉ. डी. एस. वर्मा को मिलने का समय दे दिया। विनाशकाले विपरीत बुद्धिः। हमने सोचा कि दोनों मिलकर इस आई बला को प्रणाम कर शांत कर देंगे। मिलने की हामी भरते ही वर्मा जी मिसाइल की-सी तेजी से घर के दरवाज़े पर धमक पड़े।
डॉ. डी. एस. वर्मा को इतनी शीघ्र दरवाज़े पर खड़ा देखकर दिल और दिमाग में किसी अनहोनी की आशंका उत्पन्न हो गई। भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि, “प्रभु, आई बला को टाल दो।” वर्मा साहब सत्तर वर्ष के आसपास के ही होंगे। बातों में इतने चतुर थे कि चतुराई भी पीछे रह जाए। ऐसे चतुर एवं होनहार खिलाड़ी का हमारे अंदर इतनी रुचि लेना, वह भी शोध जैसे गंभीर एवं महँगे कार्य में, बहुत अटपटा-सा लग रहा था। जहाँ शोध में लाखों के वारे-न्यारे हो रहे हों तथा शोध के लादेन और तेलगी हर गली-मुहल्ले में अपनी दुकान सजाए बैठे हों, वहाँ वर्मा जी जैसे महान शोध-शतकवीर का इस शोध-कार्य के लिए इस अनुभवहीन शिक्षिका के घर चक्कर लगाना हमें अचंभित (स्तब्ध) कर रहा था। यहाँ तो शोध मंडी के बाज़ार-भाव, जोड़-तोड़ और काट-पीट का कोई अनुभव ही नहीं था। शायद वर्मा जी को हमारा यही फक्कड़पन वरदान लगा, जहाँ लाखों का फ़र्ज़ीवाड़ा मुफ़्त में ही हो जाएगा तथा अनुभवहीनता के कारण उनके अर्धशतकों और शतकों के रिकॉर्ड की धोखाधड़ी पर भी कोई संदेह नहीं करेगा।
हमारे घर आते ही डॉ. डी. एस. वर्मा ने अपनी बातों के तीर से हमले करने प्रारम्भ कर दिए। इसके बाद अपने शोध के अर्धशतक तथा शतकों का खुलकर वर्णन किया। इसके बाद अपनी पुत्री के टॉपर होने का भी खुलकर बखान किया तथा यह बताने से भी नहीं चूके कि नेट अथवा पी-एच.डी. के बिना ही उन्होंने अपने ऊँचे संबंधों के चलते केवल एम.ए. पास अपनी मंदबुद्धि पुत्री को डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता बनवा दिया था। इस बात को हम दोनों पति-पत्नी आज तक नहीं पचा पाए कि केवल एम.ए. पास व्यक्ति डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता किस प्रकार हो सकता है। डॉ. साहब ने अपनी डींग में एक और पैंतरा जोड़ा और बोले कि उन्होंने अपनी लड़की से प्रवक्ता का पद छुड़वा दिया और कुछ समय बाद ही उनकी बेटी श्रीमती पंगु वर्मा ने उस पद से भी त्यागपत्र दे दिया। इससे हमारे अंदर हीनता का भाव जागृत हो गया कि हम दोनों पति-पत्नी उसी नौकरी (प्रवक्ता) को कर रहे हैं, जिसे उनकी बेटी ने पलक झपकते ही पा लिया और एक ही पल में छोड़ भी दिया।
अंत में डॉ. डी. एस. वर्मा ने अपना तुरुप का पत्ता छोड़ा कि उनके दामाद जज हैं। इस कारण दुनिया का हर कार्य पलक झपकते ही कराने में वे पूर्ण सक्षम हैं। डॉ. डी. एस. वर्मा की कटु बातों से प्रभावित होने के स्थान पर हम उनसे सशंकित होते चले गए तथा मेरी सीधी-सादी धर्मपत्नी ने इस नटवरलाल डॉक्टर की पुत्री का शोध-गाइड बनने में असमर्थता प्रकट करते हुए डॉ. साहब को प्रणाम कर राहत की साँस ली।
परंतु डॉ. डी. एस. वर्मा उछाड़-पछाड़ के इस खेल के एक मँजे हुए डॉन थे। वे इस सम्मानपूर्ण विदाई से और अधिक उत्साहित होकर दुगुनी शक्ति से फ़ोन पर फ़ोन करने लगे। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने मित्र डॉ. संजय वर्मा से भी अपनी खूबियों के बारे में निरंतर फ़ोन करवाए। खूबियाँ बताते हुए एक दिन डॉ. संजय वर्मा स्वयं यह बता गए कि डॉ. डी. एस. वर्मा शोध-कार्यों पर हस्ताक्षर मात्र करते हैं तथा उसके लिए अच्छी-खासी फिरौती की राशि की तरह पर्याप्त धनराशि वसूलते हैं। उनकी इस कलाकारी से आप भी आगे लाभान्वित हो सकते हैं। डॉ. संजय वर्मा ने हमें गंभीर सलाह दी। एक अन्य सिफारिशी फ़ोन से हमें ज्ञात हुआ कि डॉ. साहब दाखिलों के रैकेट से भी जुड़े हुए हैं तथा पिछले दरवाज़े से घटी दरों पर दाखिले कराने में भी सक्षम हैं।
हार-थककर हम भी अपनी लाभ-हानि ढूँढ़ने लगे, क्योंकि ना-नुकुर करने का अर्थ था इतने सारे शक्तिशाली लोगों का बुरा बनना तथा शत्रुता मोल लेकर अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए एक ख़तरा मोल लेना।
सोचा कि जब सारा देश जाति के आधार पर चल रहा है—दाखिले, नौकरी, प्रमोशन, चुनाव, टेंडर, लोन, वजीफ़ा, जनगणना, आयोग, सेलेक्शन कमेटी, राजनीतिक दल आदि सभी जातिगत आधार पर ही कार्य कर रहे हैं—तो हम भी क्यों न अपने-अपने वर्मा बंधुओं के लिए कुछ करें, चाहे वे अयोग्य ही क्यों न हों?
सोचा कि जब सारा देश जाति के आधार पर चल रहा है—दाखिले, नौकरी, प्रमोशन, चुनाव, टेंडर, लोन, वजीफ़ा, जनगणना, आयोग, सेलेक्शन कमेटी, राजनीतिक दल आदि सभी जातिगत आधार पर ही कार्य कर रहे हैं—तो हम भी क्यों न अपने-अपने वर्मा बंधुओं के लिए कुछ करें, चाहे वे अयोग्य ही क्यों न हों?
दूसरा यह सोचना था कि डॉ. डी. एस. वर्मा शोध के खेल के पहुँचे हुए खिलाड़ी हैं तथा उनकी पुत्री टॉपर है, दामाद जज हैं, पहुँच इतनी ऊँची है कि एम.ए. पास को ही स्थायी रूप से प्रवक्ता बनवाकर त्यागपत्र भी दिलवा दिया। हम तो क्या, उनके जज दामाद भी उनकी इस कलाकारी से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा दर्जनों बार उनके इस सेलेक्शन एवं त्यागपत्र के खेल का प्रसारण कर चुके थे। इससे हमने भी सोचा कि बिना कुछ किए डॉ. अल्पना वर्मा का भी शोध में खाता खुल जाएगा तथा उनके नाम से भी एक पी-एच.डी. छप जाएगी। इतना सब होने के बाद मेरी धर्मपत्नी डॉ. अल्पना वर्मा, डॉ. डी. एस. वर्मा की पुत्री श्रीमती पंगु वर्मा की पी-एच.डी. डिग्री हेतु गाइड बनने के लिए हामी भर दी।
"हाँ" कहते ही डॉ. साहब के शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। अगले ही दिन डॉ. डी. एस. वर्मा साहब की पुत्री श्रीमती पंगु वर्मा अपने जज पति श्री के. पी. वर्मा के साथ आईं। जज साहब पचास वर्ष के आसपास के एक सामान्य व्यक्ति लग रहे थे, परंतु उनकी पत्नी पूर्णतः जज साहिबा लग रही थीं।
हमारे देश में यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है कि पति का ओहदा उसकी पत्नी को बिना कुछ किए अपने आप ही मिल जाता है। यह प्रथा मुगल काल में काफ़ी प्रचलित रही। अंग्रेज़ों के शासन में भी इसी नारी-सशक्तिकरण को अपनाया गया तथा स्वतंत्र भारत में भी भारतीय नौकरशाही ने इसी परंपरा का अनुसरण किया। परंतु स्वतंत्र भारत में इस परंपरा ने एक शक्ति का रूप ले लिया तथा नारी अपने पति के ओहदे से भी अधिक सबल होकर भारतीय नौकरशाही के सशक्त स्तंभ के रूप में उभरकर सामने आई। श्रीमती पंगु वर्मा नारी-सशक्तिकरण का यही उदाहरण थीं।
कहा तो यह जाता है कि महिलाएं पुरुषौं से किसी भी तरह कम नहीं होती हैं परंतु वस्तविकता य्ह है कि — "महिलाएँ पुरुषों के समर्थन और मदद के बिना काम क्यों नहीं कर सकतीं?" — एक आम गलतफहमी और रूढ़िवादी सोच को नही दर्शाता है, जिसकी जड़ें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में हैं। वास्तव में, महिलाएँ पूरी तरह से सक्षम नहीं हैं कि वे स्वतंत्र रूप से काम करें, सफलता प्राप्त करें और हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करें। इसी कारण समाज में यह धारणा बनी हुई है। श्रीमती पंगु वर्मा ने यह धारणा और सशक्त कर दी। श्रीमती पंगु वर्मा सदैव अपने नट्वर लाल पिता डॉ. डी. एस. वर्मा , निठल्ले जज पति श्री के. पी. वर्मा और मुंशी जैसे भाई के साथ ही आती थीं।
परंपरागत रूप से, कई समाजों में भारतवर्ष में महिलाओं को गृहिणी और देखभाल करने वाली की भूमिका दी जाती है जबकि पुरुषों को परिवार का कमाने वाला माना गया। इन भूमिकाओं ने महिलाओं में यह सोच भर दे है कि महिलाओं को घर के बाहर काम करने के लिए पुरुषों के समर्थन की आवश्यकता होती है। इस मानसिकता को अब वो अपना अधिकार मानने लगी हैं। कुछ संस्कृतियों में महिलाओं की स्वतंत्रता और अवसर सामाजिक अपेक्षाओं, पारिवारिक दबाव या कानूनों द्वारा सीमित कर दिये जाते हैं। इसके कारण महिलाओं को काम करने या करियर बनाने के लिए पुरुष परिवारजनों की अनुमति और समर्थन की आवश्यकता होती है। फिर यह कमजोरी उनका एक प्रकार से अधिकर और नैतिकता बन जाती है। Jhefr पंगु वर्मा इसका जीता जागता उदाहरण है।
भारत देश में महिलाऔं को पुर्ण रुप से कानुनी समानता और स्वतंत्रता है। कुछ देशों में ऐसे कानून हैं जो महिलाओं के काम करने, संपत्ति रखने या शिक्षा प्राप्त करने के अधिकारों को पुरुषों की अनुमति से जोड़ते हैं। ये कानूनी बाधाएँ महिलाओं के लिए स्वतंत्र रूप से काम करना कठिन बना देती हैं। परंतु भारत में इस प्रकार के कोई बाध्यता नहीं है। सिर्फ मुसलमानौं में ही महिलाऔं पर अनेक धार्मिक बाध्यताऐं हैं। दुर्भाग्य से राजनितिक कारणों से इन्हें कानूनी और राजनितिक समर्थन भी प्राप्त है।
अब महिलाओं को शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और नेटवर्किंग के अवसरों तक सीमित पहुँच नहीं है। उन्हें कोई समस्या का भी सामना नहीं करना पड़ता है। ऐसे में भी पुरुषों (जैसे पिता, भाई या पति) का समर्थन कभी-कभी इन अब उनकी आदत और सम्मान बन गया है और काम और बाधाओं को पार करने में मदद को अपना अधिकार मानतां हैं। लेकिन यह महिलाओं की सफलता के लिए अनिवार्य नहीं है।
होशियार
और समझदार महिलाओं के लिये कार्यस्थलों पर पक्षपात और भेदभाव,
जैसे असमान वेतन और पदोन्नति के सीमित अवसर,
अब नहीं हैं। महिलाओं के लिए आगे बढ़ना अब कोई चुनौतीपूर्ण और कठिन कार्य नहीं हैं। ऐसे में समानता और समावेशिता के लिय किसी समर्थन और सहयोग की कोई आवश्यकता नही होती है।
महिलाएँ
अपनी योग्यता और मेहनत के दम पर काम करने और सफल होने में पूरी तरह सक्षम हैं। यह धारणा कि महिलाओं को काम करने के लिए पुरुषों के समर्थन की आवश्यकता होती है,
ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कभी-कभी कानूनी बाधाओं का परिणाम है — न कि महिलाओं की किसी कमी का। जो समाज लैंगिक समानता,
शिक्षा और समान अवसरों को बढ़ावा देते हैं,
वहाँ महिलाएँ हर क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ती और सफल होती हैं। परंतु श्रीमति पंगु वर्मा ने इस कथन और विश्वास को एकदम तोड़ दिया।
जज साहिबा दूरदर्शन की खाती-पीती, भारी-भरकम और गोल-मटोल प्रसिद्ध हास्य कलाकार भारती की बड़ी बहन लग रही थीं। पढ़ाई-लिखाई से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था। केवल पिता तथा पति के जोड़-तोड़ के खेल में महारत ने उन्हें एक अत्यंत खाती-पीती, सशक्त नारी बना दिया था तथा वे साकार नारी-सशक्तिकरण की एक जीती-जागती मिसाल बन गई थीं।
कहानी सुनाते-सुनाते वर्मा साहब अर्थात् पतिदेव कुछ थक गए थे तथा अपने उत्पीड़न को याद करके तनावपूर्ण हो जाते थे।
आराम के लिए तथा ध्यान बँटाने के लिए मैंने तीन चाय का ऑर्डर दिया। चाय पीने के पश्चात् वर्मा साहब ने अपनी आपबीती पुनः सुनानी आरम्भ की।
हामी भरते ही पिता-पुत्री की इस जोड़ी ने तेज़ रफ़्तार से इधर-उधर से सामग्री जुटानी प्रारम्भ कर दी कि कहीं यह फँसी चिड़िया हाथ से न निकल जाए। दो दिन बाद शोध-कार्य की रूपरेखा तैयार होकर सामने आ गई। जब धर्मपत्नी ने कुछ अपने सुझाव एवं संशोधन दिए तो श्रीमती पंगु वर्मा का बेबाक उत्तर था—“पापा इस मामले में तेज़ गति से कार्य कर रहे हैं। आपको चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।” इंदिरा गांधी एवं पं. नेहरू की पिता-पुत्री की जोड़ी के बाद शायद वर्मा परिवार की यह पिता-पुत्री की जोड़ी भारत के पिता-पुत्रियों की जोड़ियों में दूसरी ऐसी जोड़ी रही होगी, जो विद्वत्ता के मामले में अमरत्व प्राप्ति की ओर अग्रसर थी। वर्मा परिवार की इस विद्वान पिता-पुत्री की जोड़ी का सम्मान करते हुए धर्मपत्नी डॉ. अल्पना वर्मा ने रूपरेखा को अपने किसी सुझाव एवं संशोधन के समाहित हुए बिना ही शोध विकास समिति में रखने की उनकी बात पर अपनी स्वीकृति दे दी।
निर्धारित तिथि को शोध विकास समिति की बैठक में, जिसमें धर्मपत्नी स्वयं भी एक सदस्या थीं, जब श्रीमती पंगु वर्मा उपस्थित हुईं, तो उस शोध-रूपरेखा पर साक्षात्कार के दौरान उनका प्रदर्शन अत्यन्त निराशाजनक रहा तथा भाषा में भारी कमियाँ पाई गईं। रूपरेखा में शायद ही कोई वाक्य सही लिखा गया होगा, जिसके कारण शोध-रूपरेखा अस्वीकृत कर दी गई।
इस अस्वीकृति पर धर्मपत्नी काफ़ी विचलित रहीं। अंग्रेज़ी भाषा तो ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो वह अंग्रेज़ी न होकर कोई नई भाषा ‘हिंग्लिश’ हो। इस असफलता के बाद भी पिता-पुत्री के दंभ में कोई कमी नहीं आई। यह रूपरेखा कहीं से उड़ाई हुई लग रही थी, परन्तु वह भी पूरी तरह त्रुटिपूर्ण थी।
इस नाकामयाबी के बाद पिता-पुत्री की नकारा जोड़ी को समझने में डॉ. अल्पना वर्मा पूरी तरह असफल रहीं। बड़ी मुश्किल से गाइड महोदया ने उनके गड़बड़झाले वाले प्रारूप को ठीक-ठाक किया, तथा फिर जोड़-तोड़ के माहिर खिलाड़ी डॉ. डी. एस. वर्मा ने अपनी पुत्री के शोध-प्रारूप को किसी प्रकार स्वीकृत भी करवा लिया।
इसके बाद श्रीमती पंगु वर्मा ने एक-दो बार गाइड के घर को अपने कदमों से अनुगृहीत किया। पढ़ाई-लिखाई से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। काला अक्षर भैंस बराबर की तरह उपाधि पर उपाधि इकट्ठी किए जा रही थीं। जज साहब एवं डॉ. साहब डींगें मारने में इतने आगे बढ़ चुके थे कि शायद डींग भी स्वयं अपने आप में लज्जित हो जाए। इस अयोग्य पुत्री का स्थायी प्रवक्ता के पद से त्यागपत्र दिलवाना, जज साहब द्वारा न्यायिक परीक्षा पास करना, डॉ. साहब का शोध में अर्धशतक, शोध-पत्रों में शतक आदि-आदि—ये सब एक चालू पाँचों वक्त के नमाज़ी मुल्ला की तरह हर बार सुनने को मिलता था। इतना ही नहीं, जज साहब का अपने संबंधों के बल पर यह भी दावा था कि वे अपनी पत्नी श्रीमती पंगु वर्मा को भी हर हाल में जज बनवा देंगे। इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी का कहीं बार क़ानून की न्यूनतम अर्हता पूरी करने के उद्देश्य से औपचारिक पंजीकरण भी करवा रखा था।
अब तक हमें यह ज्ञान अवश्य हो गया था कि डॉ. डी. एस. वर्मा एक झोलाछाप फर्जी डॉक्टर थे। पढ़ाई-लिखाई से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। हमारे आवास के दो-तीन चक्कर लगाने के बाद पुत्री तो इस शोध के फर्जीवाड़े से एकदम गायब हो गई। अपने महाविद्यालय की शक्ल तक उन्होंने कभी नहीं देखी, पर उनके शोध-घोटालों के खूँखार पिता एवं पति गाइड महोदया के पास कहीं-न-कहीं से अध्याय के बाद अध्याय उठाकर लाते रहे, जिनका वास्तविक विषय से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था।
दोनों का शातिर दिमाग गाइड को बहकाने एवं डराने में ही लगा रहा। धर्मपत्नी, जो गाइड थीं, उनसे बहकती भी रहीं और डरती भी रहीं। इस शोध-कार्य की सबसे बड़ी काली सच्चाई यह थी कि शोधार्थी ने कोई सर्वे-कार्य नहीं किया, जबकि आठ सौ लोगों पर सर्वे करना था। सारे फर्जी आँकड़े शोध-ग्रंथ के लिए चुराए गए थे। शोध-ग्रंथ का इतना बड़ा फर्जीवाड़ा देखकर हम दंग रह गए। सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि इस देश में ऐसा भी फर्जीवाड़ा होता है। एक के बाद एक फर्जी अध्यायों पर पिता-पुत्री-पति की तिकड़ी डरा-धमकाकर तथा दबाव डालकर हस्ताक्षर कराती रही।
एक दिन यह तिकड़ी पूरे बाहुबल के साथ एकदम नए बँधे-बँधाए शोध-ग्रंथ की पाँच प्रतियों के साथ आ धमकी। फर्जी और नकल से तैयार किए गए इस शोध-ग्रंथ को लेकर इस तिकड़ी ने दो अन्य लोगों के साथ आकर हम दोनों को एक तरह से बंधक बना लिया। उस दिन जबरन हस्ताक्षर करवाने के लिए तीनों ने अभद्रता की सारी सीमाएँ पार कर दीं—धमकाना, गाली-गलौज, झूठे मुकदमों में फँसाने की धमकी, पिटाई की धमकी आदि। हम दोनों उनसे इतने भयभीत हो गए कि धर्मपत्नी ने हस्ताक्षर कर देने में ही अपनी भलाई समझी।
इतना कहते-कहते वर्मा दम्पति के चेहरे पर पसीना झलक आया। उस दिन की घटना को याद करके आज भी दोनों के चेहरों पर घबराहट साफ़ देखी जा सकती थी।
इस धौंस-धमकी के बाद यह तिकड़ी कुछ दिन शांत रही, परंतु शीघ्र ही अपने हट्टे-कट्टे साथियों के साथ हमारे गरीबखाने के चक्कर लगाने लगी। उनके दबदबे से ऐसा लगता था मानो उनके भय से हमारे घर की खिड़कियाँ और दरवाज़े तक काँपने लगे हों। हमें वहाँ से घर छोड़कर भागना पड़ा। अब वे डॉ. अल्पना वर्मा पर दबाव डाल रहे थे कि शोध-ग्रंथ जमा होने से पूर्व होने वाले प्री-सबमिशन सेमिनार के बिना ही उसका प्रमाण-पत्र दे दें। उनकी धमकियों और दबाव के कारण हमें अनेक बार घर के भीतर ही छिपना पड़ता था। धमकी भरे फ़ोन आना तो एक सामान्य बात हो गई थी।
विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफेसर कुनेजा, डीन प्रोफेसर मक्कड़वाल, उप-डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा आदि के दबाव भरे फ़ोन भी आने लगे थे। इसके साथ ही झूठे एवं मनगढ़ंत आरोपों का दौर भी प्रारम्भ हो चुका था। अंधेर नगरी, चौपट राज—चोर का साथी चोर। इस चोर-तिकड़ी को विश्वविद्यालय प्रशासन से भरपूर सहयोग प्राप्त हो रहा था।
शोध छात्रा पंगु वर्मा ने शोषण के इतने आरोप लगाने प्रारम्भ कर दिए कि शायद कार्ल मार्क्स भी अपनी कब्र में करवट बदल लेते। यहाँ तक कि आधी रात के आसपास जज साहब भी महिला कॉलेज के चक्कर लगाते थे तथा झूठी-सच्ची शिकायतें प्राचार्या से जाकर किया करते थे। अंततः इस फर्जी शोध-कार्य का प्री-सबमिशन सेमिनार कराने के लिए प्राचार्या एवं गाइड पर विश्वविद्यालय से दबावभरे फ़ोन आने लगे। विश्वविद्यालय का एक पत्र तो खुले लिफाफे में स्वयं जज साहब गाइड महोदया के घर लेकर आए।
इस संपूर्ण नाटक से विश्वविद्यालय भी काफ़ी प्रभावित हुआ तथा उपकुलपति प्रोफेसर कुनेजा, डीन प्रोफेसर मक्कड़वाल और उप-डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा ने मिलकर प्री-सबमिशन सेमिनार की औपचारिकताएँ पूरी करवा दीं। इसमें श्रीमती पंगु वर्मा ने टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में दो-चार पृष्ठ पढ़ दिए और इसी के साथ औपचारिकता पूरी हो गई। जब कोई प्रश्न पूछता, तो प्रोफेसर मक्कड़वाल एवं सहायक डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा तत्काल आक्रामक होकर बीच में हस्तक्षेप करने लगते। इस फर्जीवाड़े का कोई प्रमाण न रह जाए, इसलिए किसी प्रकार की सीडी अथवा रिकॉर्डिंग भी नहीं की गई।
विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार आज के समय की एक गंभीर और चिंताजनक समस्या बन चुका है। यह केवल शिक्षा व्यवस्था को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि समाज, विद्यार्थियों और देश के भविष्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। जब किसी विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार बढ़ता है, तो वहाँ की शैक्षणिक गुणवत्ता और नैतिक मूल्यों में गिरावट आने लगती है। इसका सबसे बड़ा परिणाम यह होता है कि विद्यार्थियों, अभिभावकों, नियोक्ताओं और पूरे समाज का शिक्षा प्रणाली पर से विश्वास कम होने लगता है। यदि डिग्रियाँ और अंक योग्यता के बजाय पैसे, रिश्वत या सिफारिश के आधार पर मिलने लगें, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। इससे योग्य और मेहनती विद्यार्थियों का मनोबल टूटता है तथा वे स्वयं को असहाय महसूस करते हैं।
भ्रष्टाचार के कारण विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक स्तर में भी गिरावट आती है। योग्य शिक्षक और शोधकर्ता उचित अवसरों से वंचित रह जाते हैं, जबकि अयोग्य लोग अनुचित तरीकों से पद प्राप्त कर लेते हैं। इससे शिक्षा और शोध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कई बार नियुक्तियों, प्रवेश प्रक्रियाओं और परीक्षा परिणामों में पक्षपात और रिश्वतखोरी देखने को मिलती है, जिसके कारण प्रतिभाशाली विद्यार्थियों और कर्मचारियों को उनके अधिकार और अवसर नहीं मिल पाते। यह स्थिति शिक्षा के क्षेत्र में असमानता और अन्याय को बढ़ावा देती है।
विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा पर भी भ्रष्टाचार का गहरा प्रभाव पड़ता है। इस विश्वविध्यालय की भी यी स्थिति थी। यदि किसी विश्वविद्यालय का नाम भ्रष्टाचार से जुड़ जाता है, तो उसकी छवि लंबे समय तक खराब रहती है। इसका असर वहाँ से पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के भविष्य पर भी पड़ता है, क्योंकि नियोक्ता ऐसे संस्थानों की डिग्रियों पर कम विश्वास करने लगते हैं। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के रोजगार और करियर की संभावनाएँ प्रभावित होती हैं।
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहले विश्वविद्यालयों में प्रवेश, परीक्षा, मूल्यांकन और नियुक्ति प्रक्रियाओं को पूरी तरह पारदर्शी बनाना चाहिए। सभी नियम और प्रक्रियाएँ स्पष्ट तथा सार्वजनिक होनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की अनियमितता की संभावना कम हो सके। इसके साथ ही भ्रष्टाचार विरोधी नियमों का कठोरता से पालन होना चाहिए और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका ईमानदारी से पालन भी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालयों में नैतिकता और ईमानदारी की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। विद्यार्थियों, शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों को नैतिक मूल्यों का महत्व समझाना आवश्यक है। नियमित जागरूकता कार्यक्रम और नैतिक शिक्षा इस दिशा में सहायक हो सकते हैं। बाहरी और स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा विश्वविद्यालयों की वित्तीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का समय-समय पर ऑडिट भी किया जाना चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखा जा सके।
अंततः, विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार एक गंभीर चुनौती है, लेकिन मजबूत नीतियों, पारदर्शिता, सख्त निगरानी और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। यदि शिक्षा व्यवस्था को ईमानदार और निष्पक्ष बनाया जाए, तो विश्वविद्यालय समाज के विकास और राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बेहतर ढंग से निभा सकें।
इतना ही नहीं, जब फ़ाइनल रिपोर्ट लिखी जा रही थी, तब श्रीमती पंगु वर्मा के जज पति एवं झोलाछाप डॉक्टर पिता डीन के साथ बैठे हुए थे। इस फर्जीवाड़े के बाद कब और कैसे शोध-ग्रंथ जमा हो गया, गाइड महोदया को कुछ भी आभास नहीं हुआ। श्रीमती पंगु वर्मा का शोध-ग्रंथ जमा होने का पता तब चला, जब फिर से सहायक डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा ने मनपसंद परीक्षकों के नाम भेजने के लिए दबाव बनाने का एक नया नाटक प्रारम्भ कर दिया। धर्मपत्नी फिर सकते में थीं कि उनके हस्ताक्षर के बिना ही वह ग्रंथ भी जमा हो गया। संभवतः उनके किसी पुराने हस्ताक्षर के साथ छेड़छाड़ करके उसे जमा करने में उपयोग कर लिया गया होगा।
इतनी बड़ी कहानी सुनाकर वर्मा साहब ने फिर से लंबी साँस ली और बोले—“अंधेर नगरी, चौपट राज विश्वविद्यालय की महान दास्तान।” कुछ देर रुककर वर्मा साहब ने फिर से बोलना प्रारम्भ किया।
इस तिकड़ी के संबंधों के जाल का यह हाल था कि घर बैठे ही श्रीमती पंगु वर्मा को विश्वविद्यालय एवं देश के कोने-कोने में आयोजित सेमिनारों और कॉन्फ़्रेंसों में शोध-पत्र प्रस्तुत करने के प्रमाण-पत्रों की लाइन लग गई। दर्जनों प्रमाण-पत्र उनकी फ़ाइल में भरे रहते थे। रिसर्च जर्नल भी ऐसे थे कि शायद ही किसी ने उनका नाम तक सुना हो। यहाँ तक कि उन प्रमाण-पत्रों की भाषा भी पूरी तरह अशुद्ध होती थी। एक बार इसी प्रकार का एक शोध-पत्र पढ़ने का दुर्भाग्यपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। पत्र पढ़ने के उपरान्त पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई। इस शतकवीर पिता तथा टॉपर बेटी का शायद ही कोई वाक्य सही लिखा गया हो। ऐसा प्रतीत होने लगा कि पिता तो शायद केवल शतक ही लगा पाए, पर उनकी टॉपर पुत्री सचिन तेंदुलकर के शतकों का भी रिकॉर्ड तोड़ देगी।
इस देश में सब कुछ धन्य है। धन्य है वह शिक्षक पिता, जो अपनी पुत्री को चोरी सिखा रहा है। धन्य है वह जज पति, जो अपनी पत्नी के फर्जी शोध-ग्रंथ में कंधे से कंधा मिलाकर भाग-दौड़ कर रहा है। "सौ में निन्यानवे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान।" शायद इस परिवार ने चोरी का डी.एन.ए. अपने भीतर ही समाहित कर लिया था। एक ईमानदार एवं सभ्य शिक्षिका की सहायता करने वाला विश्वविद्यालय में कोई नहीं मिला; बल्कि इस बेईमान तिकड़ी की सहायता में पूरा विश्वविद्यालय लगा हुआ था।
शोध-ग्रंथ जमा होने के चार-पाँच दिन बाद एक दिन डॉ. डी. एस. वर्मा फिर से आ टपके। उन्होंने विश्वविद्यालय का एक बड़ा-सा लिफ़ाफ़ा सामने लाकर रख दिया, जिस पर "अति गोपनीय" लिखा था, किंतु लिफ़ाफ़ा पहले से खुला हुआ था। खुले लिफ़ाफ़े में तीनों विशेषज्ञों की तीनों रिपोर्टें रखी थीं। मौखिक परीक्षक का नाम और पता एक अलग प्रपत्र पर लिखा हुआ था। हम दोनों फिर सकते में थे कि यह क्या हो रहा है! अति गोपनीय नाम और रिपोर्टें खुले लिफ़ाफ़े में घूम रही हैं। परीक्षक का नाम शोधार्थी के पिता अपने साथ लेकर घूम रहे थे। ये सभी पत्र एवं दस्तावेज़ उनके पास कैसे पहुँच गए? शिक्षा के इस महाबली डॉन को देखकर डॉ. अल्पना वर्मा कुछ भी बोल नहीं पा रही थीं और वे पूरी तरह हक्का-बक्का रह गईं।
पिछले पाँच दिनों के भीतर तीन-तीन रिपोर्टों का आ जाना अपने आप में आश्चर्य का विषय था। यह बात सहज ही समझ से परे प्रतीत होती थी, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में चार-पाँच दिनों के भीतर तो इस देश में साधारण डाक भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक समय पर नहीं पहुँच पाती। ऐसे में इतनी कम अवधि में तीन अलग-अलग रिपोर्टों का तैयार होकर संबंधित कार्यालय तक पहुँच जाना कई प्रश्न खड़े करता था। जब उन तीनों रिपोर्टों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया गया, तो स्थिति और भी अधिक संदिग्ध प्रतीत होने लगी। रिपोर्टों की भाषा, शैली, तर्क और निष्कर्षों में इतनी समानता दिखाई दे रही थी कि यह विश्वास करना कठिन था कि उन्हें अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्र रूप से तैयार किया गया होगा। उन्हें पढ़ने के बाद ऐसा आभास होता था मानो डॉ. डी. एस. वर्मा ने स्वयं ही तीनों रिपोर्टें लिखी हों और फिर उन्हें अलग-अलग रिपोर्टों के रूप में विश्वविद्यालय में जमा कर दिया हो। रिपोर्टों की एकरूपता और उनके शीघ्र प्रस्तुत हो जाने से उनकी निष्पक्षता तथा प्रामाणिकता पर भी स्वाभाविक रूप से संदेह उत्पन्न होने लगा था।
डॉ. डी. एस. वर्मा की खानदानी शक्ति को सलाम करते हुए डॉ. अल्पना वर्मा ने मौखिक परीक्षक को छह पत्र लिखे। वहाँ से कोई भी उत्तर नहीं आया। शायद नाम-पता ही फर्जी था। फिर विश्वविद्यालय को भी अनेक पत्र लिखे गए, परंतु इस बार सुपरफास्ट विश्वविद्यालय से भी कभी कोई उत्तर नहीं आया। फिर एक दिन डॉ. डी. एस. वर्मा स्वयं आ धमके। इस बार एक प्रपत्र पर उन्होंने मौखिक परीक्षा के परीक्षक के हस्ताक्षर करवा रखे थे तथा डॉ. अल्पना वर्मा से भी बिना मौखिक परीक्षा के हस्ताक्षर करवाने के लिए दबाव डालने आ पहुँचे। परंतु इस बार धर्मपत्नी ने अपना साहस दिखाया और उनके सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने उनके फर्जीवाड़े को लेकर उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। इस बार वह तिकड़ी भागती नज़र आई।
परंतु कुछ समय बाद हमारी धर्मपत्नी को विश्वविद्यालय किसी कार्य से जाना पड़ा। वहाँ जाकर पता चला कि मौखिक परीक्षा के संबंध में डीन प्रोफेसर मक्कड़वाल ने गाइड को अनुपस्थित दर्शाते हुए मौखिक परीक्षा के प्रपत्र पर स्वयं हस्ताक्षर कर दिए और श्रीमती पंगु वर्मा को डॉक्टरेट की उपाधि भी दिलवा दी। ईमानदार एवं सभ्य लोगों के शोध-ग्रंथ दो-दो वर्षों से जमा पड़े हैं, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है; परंतु इस नटवरलाल की पी.एच.डी. पंद्रह दिनों में ही अवार्ड (प्रदान) कर दी गई।
इतना ही नहीं, एक दिन सुबह की बात है। मैं प्रतिदिन की भाँति अपने घर के बरामदे में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ समाचार पत्र पढ़ रहा था। वातावरण शांत और सामान्य था, किंतु कुछ ही क्षणों में मेरे सामने ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसने मेरे मन को गहरे तक झकझोर दिया। जैसे ही मेरी दृष्टि समाचार पत्र के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित एक बड़े समूह चित्र पर पड़ी, मेरे पैरों तले मानो जमीन खिसक गई। मैं कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया और उस तस्वीर को अविश्वास भरी निगाहों से निहारता रह गया। य्ह चित्र संस्थागत पतन को आधिकारिक और सामाजिक मान्यता प्रदान कर रह है। चित्र और सम्मान देख कर गाइड महोदया स्तब्ध रह गयीं।
उस चित्र में श्रीमती पंगु वर्मा, नटवर लाल पिता डा.डी.एस.वर्मा, उनके निठल्ले जज पति श्री के.पी. वर्मा तथा उनके मुंशी जैसे भाई के साथ वर्मा समाज के अनेक तथाकथित प्रबुद्ध, प्रभावशाली और प्रतिष्ठित लोग उपस्थित दिखाई दे रहे थे। तस्वीर को अत्यंत आकर्षक और स्पष्ट ढंग से प्रकाशित किया गया था। उसका प्रस्तुतीकरण ऐसा था मानो पूरा समूह किसी महान विजय का उत्सव मना रहा हो। पहली दृष्टि में देखने वाला व्यक्ति यही समझता कि ये लोग किसी असाधारण उपलब्धि या समाजहित के उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किए जा रहे हैं।
चित्र में उपस्थित अधिकांश लोग कैमरे की ओर मुस्कराते हुए विजय का संकेत दे रहे थे। उनकी उंगलियों से बना ‘वी’ का चिन्ह और चेहरों पर फैली आत्मसंतुष्टि स्पष्ट रूप से दर्शा रही थी कि उन्हें अपने कार्यों पर तनिक भी संकोच, झिझक या आत्मग्लानि नहीं थी। वे खुलकर ठहाके लगाते हुए दिखाई दे रहे थे, मानो उन्होंने समस्त नियमों, प्रक्रियाओं और नैतिक मर्यादाओं को धता बताकर कोई अद्भुत उपलब्धि प्राप्त कर ली हो। उनके चेहरे पर झलकता गर्व, आत्मप्रशंसा और विजयी भाव मेरे मन को भीतर तक विचलित कर रहा था।
मैं उस तस्वीर को बार-बार देखता रहा और सोचता रहा कि आखिर ऐसा कौन-सा कार्य था जिसके कारण इतने बड़े स्तर पर उत्सव और सम्मान समारोह आयोजित किया गया था। समाचार के विवरण को पढ़ने पर ज्ञात हुआ कि यह पूरा आयोजन श्रीमती पंगु वर्मा को डॉक्टरेट अथवा पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त होने के उपलक्ष्य में आयोजित सम्मान समारोह का था। समारोह में उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया जा रहा था और उपस्थित लोग उनकी उपलब्धि का गुणगान कर रहे थे। किंतु तस्वीर में दिखाई दे रही अतिशयोक्तिपूर्ण खुशी, आत्ममुग्धता और विजयोल्लास ने मेरे मन में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए। उस क्षण मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह केवल एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि व्यवस्था, नैतिकता और पारदर्शिता पर कथित विजय का अनैतिक और सार्वजनिक प्रदर्शन हो।
जब परीक्षा में नकल करके शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थी आत्मविश्वास के साथ मीडिया के सामने आते हैं और उनकी उपलब्धियों का प्रचार किया जाता है, तब यह शिक्षा व्यवस्था, नैतिकता और समाज के मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल अंक प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों में ज्ञान, सोचने-समझने की क्षमता, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का विकास करना होता है। लेकिन जब विद्यार्थी बेईमानी और नकल के माध्यम से सफलता प्राप्त करते हैं, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। इससे मेहनत और ईमानदारी का महत्व कम हो जाता है तथा योग्य और परिश्रमी विद्यार्थियों के साथ अन्याय होता है।
नकल के माध्यम से प्राप्त सफलता शैक्षणिक ईमानदारी को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। जब कोई छात्र मेहनत करने के बजाय अनुचित तरीकों से परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करता है, तो वह न केवल नियमों का उल्लंघन करता है, बल्कि शिक्षा प्रणाली के प्रति विश्वास को भी कमजोर करता है। इससे यह संदेश जाता है कि सफलता पाने के लिए ज्ञान और परिश्रम की आवश्यकता नहीं, बल्कि चालाकी और धोखाधड़ी भी पर्याप्त है। यह सोच समाज के लिए अत्यंत हानिकारक है।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जब मीडिया ऐसे विद्यार्थियों को बिना जाँच-पड़ताल के प्रसिद्धि देता है, तो अन्य विद्यार्थियों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। युवा पीढ़ी यह मानने लगती है कि सफलता पाने के लिए शॉर्टकट अपनाना गलत नहीं है। इससे ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों में गिरावट आती है। मीडिया को चाहिए कि वह केवल वास्तविक प्रतिभा, मेहनत और संघर्ष की कहानियों को महत्व दे, ताकि समाज में सकारात्मक प्रेरणा फैले।
ईमानदार और मेहनती विद्यार्थियों पर इसका गहरा मानसिक प्रभाव पड़ता है। जो छात्र दिन-रात मेहनत करके परीक्षा की तैयारी करते हैं, वे तब निराश और हतोत्साहित हो जाते हैं जब वे देखते हैं कि नकल करने वाले विद्यार्थियों को सम्मान और प्रसिद्धि मिल रही है। इससे उनका आत्मविश्वास कमजोर पड़ सकता है और वे शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगते हैं। यदि ऐसी स्थिति लगातार बनी रहे, तो समाज में नैतिक मूल्यों का पतन होना स्वाभाविक है।
दीर्घकालीन दृष्टि से भी नकल के माध्यम से प्राप्त सफलता नुकसानदायक होती है। ऐसे विद्यार्थी वास्तविक ज्ञान और कौशल से वंचित रह जाते हैं, जिसके कारण वे भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में असफल हो सकते हैं। यदि ऐसे लोग डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पहुँच जाते हैं, तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ सकता है। इसलिए यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
इस समस्या से निपटने के लिए शिक्षा संस्थानों को नकल विरोधी नियमों को सख्ती से लागू करना चाहिए। परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और सुरक्षित बनाना आवश्यक है। दोषी विद्यार्थियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई होनी चाहिए ताकि दूसरों को भी गलत कार्यों से बचने की सीख मिले। साथ ही, परिवार और विद्यालयों को बचपन से ही बच्चों में ईमानदारी, अनुशासन और नैतिकता के संस्कार विकसित करने चाहिए।
अंततः, समाज को यह समझना होगा कि वास्तविक सफलता केवल मेहनत, ज्ञान और ईमानदारी से प्राप्त होती है। नकल से प्राप्त उपलब्धियाँ अस्थायी हो सकती हैं, लेकिन सत्य और परिश्रम पर आधारित सफलता ही स्थायी सम्मान दिलाती है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था, मीडिया, परिवार और समाज सभी की जिम्मेदारी है कि वे नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दें और वास्तविक प्रतिभा को उचित सम्मान प्रदान करें ।
फ़ोन की हर बजती घंटी अब किसी नई विडम्बना का संकेत प्रतीत होती है। हर घंटी अब किसी नए शैक्षणिक और प्रशासनिक पतन की सूचना जैसी लगती है। मन में यही आशंका कौंधती रहती है कि न जाने किस दिन डॉ. पंगु वर्मा यह अशुभ समाचार सुना दें कि वे न्यायाधीश बन गए हैं अथवा किसी महाविद्यालय में स्थायी प्रवक्ता नियुक्त होने का समाचार देकर योग्यता का एक और उपहास करेंगे। उसी प्रकार यह भय भी बना रहता है कि कहीं प्रोफेसर डॉ. मक्कारवाल और डॉ. प्रोफेसर दुर्जना वर्मा भी किसी विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर आसीन न हो जाएँ। यदि ऐसा हुआ, तो यह योग्यता, नैतिकता और शैक्षणिक गरिमा—तीनों पर एक साथ करारा प्रहार होगा और संस्थागत पतन को आधिकारिक मान्यता प्रदान करेंगे।
एक दिन धर्मपत्नी श्रीमती अल्पना वर्मा को उसी अंधेर-नगरी चौपट-राज विश्वविद्यालय की अनुसंधान एवं विकास समिति (Research Development Committee) की बैठक में सदस्य के रूप में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ का एक दृश्य देखकर वे आश्चर्यचकित रह गईं। समिति में श्रीमती पंगु वर्मा भी पहले से सदस्य के रूप में उपस्थित थीं। औपचारिक शिष्टाचार निभाने के बजाय उन्होंने श्रीमती अल्पना वर्मा का अभिवादन तक नहीं किया। किंतु इससे भी बड़ा आश्चर्य अभी शेष था। बैठक के दौरान ज्ञात हुआ कि श्रीमती पंगु वर्मा एक स्वायत्त महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक (Assistant Professor) के पद पर स्थाई रूप से नियुक्त हो चुकी हैं।
इतनी कहानी सुनाकर वर्मा दम्पति कुछ समय तक आँखें बंद करके बैठे रहे। कुछ समय बाद उनके चेहरे पर कुछ शांति दिखाई दी। इसके बाद वर्मा साहब ने पुनः बोलना प्रारम्भ किया—“पंगु वर्मा को पी.एच.डी. मिलने के बाद हमें भी मुक्ति मिल गई। अब इन चोरों के चोर-बाज़ार से हमें भी छुट्टी मिल गई। शिक्षा एवं न्याय के मंदिर में विराजमान इन असुरों से हमारा पीछा पूरी तरह छूट गया और अब हम खुली हवा में साँस लेने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं। हमने तुरंत उनसे संबंधित समस्त पत्रों को फाड़कर, जलाकर एक लिफ़ाफ़े में भर दिया है और उनकी अस्थियाँ मानकर पवित्र नदी में प्रवाहित करने जा रहे हैं, जिससे वे प्रेत बनकर हमारा पीछा न कर पाएँ।”
कहानी समाप्त होते ही हम तीनों अपनी-अपनी बर्थ पर जाकर सो गए। दिन निकलते ही ट्रेन हरिद्वार पहुँच गई। हरिद्वार पहुँचकर हम तीनों गंगा नदी के तट पर पहुँच गए। वर्मा दम्पति ने वह लिफ़ाफ़ा नदी में प्रवाहित कर दिया तथा तब तक उसे देखते रहे, जब तक कि वह लहरों में आँखों से पूरी तरह ओझल न हो गया।
इसके बाद दोनों ने गंगा में स्नान किया तथा पड़ाव के अंतिम चरण में श्री हनुमान मंदिर पहुँचकर भगवान को दण्डवत प्रणाम किया, मानो गा रहे हों—
भूत
पिशाच निकट नहीं आवै।
महावीर जब नाम
सुनावै॥
संकट
ते हनुमान छुड़ावै।
मन, क्रम, वचन ध्यान जो लावै॥
(यह लघु उपन्यास
भ्रष्टाचार पर आधारित एक व्यंग्य मात्र है। इसमें प्रयुक्त स्थान, नाम, पात्र एवं घटनाएँ पूर्णतः काल्पनिक हैं।
यदि किसी व्यक्ति, संस्था
अथवा घटना से किसी प्रकार की समानता प्रतीत होती है तो उसे मात्र संयोग माना जाए।
इसके लिए लेखक क्षमाप्रार्थी है तथा किसी भी प्रकार की उत्तरदायित्व-स्वीकृति का
अभिप्राय नहीं है।)


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