मैंने देखा है
मंदिरों में करोड़ों की चोरी देखी,
पर उसी
प्रवेश-द्वार पर
पैसे-पैसे को
तरसते
नन्हे हाथ भी देखे
हैं।
भंडारों की सजी
हुई पंगतें देखीं,
जहाँ तृप्ति का
उत्सव था;
और बाहर
भूख से बिलखते
बच्चों की आँखों में
रोटी का सपना मरते
देखा।
धूप, अगरबत्ती और रेशमी चादरों में लिपटी
ईंट-पत्थर की दरगाहों
को सजते देखा,
पर उसी चौखट के
बाहर
एक वृद्ध मनुष्य
को
ठंड से अकड़कर दम
तोड़ते देखा।
वह लाखों का दान
देकर लौटा था
लंगर और सेवा के
नाम पर;
पर अगले ही मोड़
पर
उसे कुछ सिक्कों
के लिए
नशे का ज़हर बेचते
देखा।
कहा जाता है—
किसी ने सूली पर
चढ़कर
मानवता का दुःख
अपने ऊपर ले लिया था;
पर आज
ईश्वर के नाम पर
धर्म का सौदा होते
देखा।
जो पाँचों वक्त
इबादत में झुकता था,
उसके अपने ही घर
में
कुपोषण से जूझती
पत्नी को
प्रसव-पीड़ा में
दम तोड़ते देखा।
जिसने जीते-जी
माँ-बाप को भरपेट
रोटी न दी,
उसी को उनकी
मृत्यु के बाद
तेरहवीं पर विशाल
भोज कराते देखा।
जिस बेटी ने
स्वतंत्रता के नाम
पर
माता-पिता का हृदय
तोड़ा,
उसी को बाद में
अपमान और हिंसा
सहते देखा।
वह तांत्रिक भी
एक सड़क दुर्घटना
में चला गया,
जो दूसरों की
हथेलियों की रेखाएँ पढ़ता था,
पर अपनी नियति न
पढ़ सका।
जिस देश के
संयुक्त परिवारों की
दुनिया मिसाल देती
थी,
आज उसी देश में
भाई-बहनों को
गजभर ज़मीन के लिए
थानों और अदालतों में
लड़ते देखा।
साँपों ने जैसे
ज़हर उगलना छोड़
दिया हो,
अब इंसान ही
इंसान को डसता है।
गिरगिट भी
रंग बदलने में
शर्मिंदा होगा;
इंसान ने तो
स्वार्थ के लिए
हर रंग को व्यापार
बना दिया है।
और गिद्ध...
शायद उन्होंने भी
मांस खाना कम कर
दिया होगा,
जब देखा कि
त्योहारों और
उत्सवों के नाम पर
इंसान स्वयं
धरती के हर जीव का
सबसे बड़ा भक्षकबन बैठा।
मैंने मंदिर भी
देखे,
मस्जिदें भी,
गुरुद्वारे, चर्च और दरगाहें भी।
पर सबसे अधिक
मैंने भूखा इंसान
देखा,
अकेला इंसान देखा,
और धर्म के शोर
में
दम तोड़ती हुई
मानवता को देखा।


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