समुद्र मंथन और टीचर का लोटा
पुराने समय के शिक्षक, शिक्षकों की दशा पर एक व्यंग्यपूर्ण किंतु अत्यंत मार्मिक कहानी सुनाया करते थे।
कहते हैं कि जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया, तब उनके सामने एक बड़ी समस्या उत्पन्न हुई। समुद्र से निकलने वाले बहुमूल्य रत्नों, दिव्य वस्तुओं और अमृत की सुरक्षा के साथ-साथ पूरे कार्य की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो निष्ठावान, परिश्रमी और पूर्णतः ईमानदार हो।
लंबे विचार-विमर्श के बाद देवता और असुर सहायता तथा सलाह लेने एक आश्रम पहुँचे। उन्होंने आश्रम के महंत को अपनी समस्या और आवशयकता बताई।
महंत ने सबकी
बातें ध्यान से सुनीं और इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए आश्रम के एक शिक्षक की ड्यूटी
लगा दी।
“इस कार्य के लिए
हमारे आश्रम का एक शिक्षक सबसे उपयुक्त रहेगा।”
महंत ने विश्वासपूर्वक कहा,
“यह व्यक्ति
निर्धन अवश्य है, परंतु ईमानदारी
और कर्तव्यनिष्ठा में इसका कोई मुकाबला नहीं।”
कुछ ही देर में वह शिक्षक उनके सामने उपस्थित हुआ।
जब देवताओं और असुरों ने उस शिक्षक को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। शिक्षक का सिर मुंडा हुआ था। सिर पर केवल एक ज्ञान-शिखा (चोटी) थी। शरीर पर कोई आडंबर नहीं था—वक्ष पर सिर्फ जनेऊ धारण किये हुये था तथा नीचे साधारण केसरिया धोती थी। एक हाथ में खाली लोटा और दूसरे हाथ में छोटी-सी छड़ी लिए वह शांत भाव से एक ज्ञानी--तपस्वी की तरह अपनी ड्यूटी पर चल पड़ा।
उस गरीब, ईमानदार और कर्मठ शिक्षक को “सहायक मंथन एवं सुरक्षा अधिकारी” बना दिया गया।
समुद्र मंथन
आरम्भ हुआ। एक-एक कर अनेक रत्न निकले। कभी देवताओं में उत्साह बढ़ता, कभी दानवों में लालच जागता; परंतु शिक्षक निरंतर अपने कर्तव्य में लगा रहा।
उसने न दिन देखा, न रात—बस पूरी निष्ठा से कार्य करता रहा।
अंततः समुद्र से
अमृत कलश प्रकट हुआ और उसके वितरण की तैयारी हुई।
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया। देवताओं को पंक्ति में बैठाकर उन्हें अमृत पिलाया जाने लगा। तभी स्वरभानु नामक एक असुर, देवता का वेश बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और छलपूर्वक अमृत पी लिया। जैसे ही सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचाना, उन्होंने तुरंत भगवान विष्णु को संकेत दिया। भगवान विष्णु ने तत्काल सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
परंतु अमृत का प्रभाव हो चुका था। इसलिए वह मरा नहीं। उसका सिर “राहु” और धड़ “केतु” कहलाया और दोनों हिस्से ग्रह के रुप में अमर हो गये।
उधर देवताओं ने
अमृत पान कर अमरत्व प्राप्त कर लिया। चारों ओर विजयोल्लास छा गया। असुर हार गए।
जय-जयकार होने लगी।
और उस शिक्षक को
क्या मिला?
उसके हाथ में वही खाली लोटा पकड़ा दिया गया।
सबने उसकी ईमानदारी, मेहनत और निष्ठा की खूब प्रशंसा की। देवताओं ने महंत को भी धन्यवाद दिया कि उन्होंने इतना योग्य व्यक्ति भेजा।
शिक्षक चुपचाप
खाली लोटा लेकर आश्रम लौटने लगा।
रास्ते में कुछ ऐसे पत्रकारों की नज़र उस पर पड़ी, जो अफवाह और सनसनी फैलाने में माहिर थे। उन्होंने शिक्षक के हाथ में लोटा देखा, उसकी तस्वीर ली और अगले ही दिन यह खबर फैला दी—
“शिक्षक ने पूरा एक लोटा अमृत स्वयं पी लिया!”
बस, तभी से यह परंपरा बन गई कि हर कठिन, जोखिम भरे और जिम्मेदारी वाले कार्य में शिक्षक की ड्यूटी लगा दी जाती है।
और वह बेचारा,
अपनी ईमानदारी के बावजूद, हमेशा गरीब का गरीब ही बना रहा और खाली लोटा हाथ
में लेकर घुमता रहता है।

