Monday, 31 August 2026

मनुस्मृति: सुविधाजनक निशाना

 

जब मुद्दाविहीन हो जाओ—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब आधुनिक कहलाना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब बुद्धिजीवी बनना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब सेकुलर चेहरा दिखाना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब ‘लिबरल’ कहलाना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब ‘वोक’ होने का प्रमाण हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब प्रगतिशीलता का तमगा पाना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब दलितों का हितैषी बनना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब जाति-विरोध का सुमो पहलवान बनना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब परीक्षा में शून्य अंक आएँ,
या अंक माइनस में जाएँ—
अपनी कमजोरी न मानो,
मनुस्मृति को गाली दो।

जब अपनी राजनीति चमकानी हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब तुष्टिकरण का गाज़ी बनना हो—
मनुस्मृति को गाली दो।

जब कानून-व्यवस्था का प्रश्न उठे,
जब सुरक्षा बल अपराध रोकें—
तथ्य न देखो, संदर्भ न खोजो,
मनुस्मृति को गाली दो।

न संस्कृत का ज्ञान जरूरी,
न ग्रंथ को पढ़ना जरूरी;
न इतिहास की समझ जरूरी,
न संदर्भों की खोज जरूरी।

बस इतना भर काम करो—
एक आसान निशाना चुन लो,
एक पुराना नाम उछाल दो,
और हर सवाल का एक ही जवाब दो—
मनुस्मृति को गाली दो।

यह भी मत पूछो
कि जिस ग्रंथ पर प्रहार हो रहा है,
उसका काल क्या था,
संदर्भ क्या था,
समाज की संरचना कैसी थी,
और उसमें कही बातों की
व्याख्या का आधार क्या था।

न अध्ययन चाहिए,
न प्रमाण चाहिए,
न तर्क-वितर्क का विस्तार—
बस चाहिए एक तैयार हथियार,

जिसे कोलोनियल राज दे गया,
एक सुविधाजनक विचार—
मनुस्मृति को गाली दो,
और बन जाओ प्रगतिशील विचार।

विडंबना देखिए—
कुछ अन्य धर्मग्रंथों की
आपत्तिजनक बातों पर
वही निर्भीकता भय में बदल जाती है;
जहाँ प्रश्न कठिन हो जाता है,
वहाँ आवाज़ गायब हो जाती है।

फिर मनुस्मृति ही क्यों?
क्यों वही बार-बार कटघरे में?
क्या सचमुच मुद्दा वही है,
या कोई और खेल है पर्दे के पीछे?

शायद मनुस्मृति
असली मुद्दा है ही नहीं—
असली मुद्दा है
सुविधाजनक निशाना चुनना।

ऐसा निशाना
जिस पर प्रहार आसान हो,
जिसके बचाव में कोई शोर न हो,
जिसे पढ़े बिना भी कोसा जा सके,
जिसे समझे बिना भी दोष दिया जा सके।

पर आलोचना से डरना भी नहीं—
आलोचना हो हर विचार की,
हर परंपरा और व्यवहार की;
हर धर्मग्रंथ, हर सामाजिक व्यवस्था की,
हर उस रूढ़ि और विचारधारा की—
जहाँ अन्याय, भेदभाव या अमानवीयता हो,
जहाँ मनुष्य की गरिमा आहत होती हो।

पर आलोचना का पैमाना
सबके लिए समान होना चाहिए;
तर्क यदि एक है,
तो साहस भी समान होना चाहिए।

जिस कसौटी पर
एक ग्रंथ को परखा जाए,
उसी कसौटी पर
दूसरे को भी कसा जाए।

जिस प्रश्न पर
एक परंपरा को कठघरे में खड़ा किया जाए,
वही प्रश्न
हर परंपरा से पूछा जाए।

क्योंकि किसी एक ग्रंथ को गाली देना
न ज्ञान का प्रमाण है,
न आधुनिकता का सम्मान है,
न बुद्धिजीविता की पहचान है,
न प्रगतिशीलता का बयान है।

सच्चा साहस तो तब है—
जब अपना भी आईना देखा जाए,
हर विचार को एक ही तराजू में तौला जाए,
और सत्य के आगे
हर पूर्वाग्रह को झुका दिया जाए।

क्योंकि समस्या आलोचना में नहीं,
समस्या चयनात्मक आलोचना में है।

समस्या किसी एक ग्रंथ पर प्रश्न उठाने में नहीं,
समस्या प्रश्नों के दोहरे मापदंड में है।

और याद रखिए—
जिस आलोचना में समानता नहीं,
वह आलोचना नहीं, सुविधा है;
जिस तर्क में निष्पक्षता नहीं,
वह तर्क नहीं, घृणा है।


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