Wednesday, 20 October 2021

मौत का पैगाम

अबके बसंत में शरारत मेरे साथ हुई, पतझड़ मेरे बाग में और आतंकी के बरसात हुई। दुनिया हँसने लगी मेरे दर्दे दिल पर, मै कराह रहा था और वहां आतिशबाजी हुई। सदियों से पाठ प्रेम का पढ्ते पढाते रहे, पर बदले मै हम पर खून की बारिश हुई। हर दिन हर रात पिट कर हम सोये, पर उनके दिल मे रहम की आहट ना हुई। मैंने पूछा कि कहीं प्यार की बयार चली ? तभी कातिलों ने कलेजे पर खंजर घुमाई। ये पैगामे मौहब्बत सब फरेब है मेरे भाई, उनके लिये मौत का पैगाम ही इबादत हुई।

Friday, 17 September 2021

जज साहिबा की डाक्टरेट

दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी, अराजक माहौल, नित्य घौटालों एवं भ्रष्टाचार के समाचारों से तंग आकर मन को कहीं दूर ठंडक मंें जाकर, शान्ति देने की कामना, से वशीभूत होकर, मैं अपने आप ही हरिद्वार चल पड़ा। संध्या समय मैंने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से हरिद्वार पैसेंजर गाड़ी पकड़ी। पैसेंजर गाड़ी के अनेक लाभ होते हैं। पहला सीट आराम से मिल जाती है। असली भूखे, नंगे, चोर भारत के मुफ्त में दर्शन हो जाते हैं। साइकिल की गति से चलने के कारण सामान्य ज्ञान, भूगोल, इतिहास, अपने आप अच्छा होता जाता है आदि-ंउचयआदि। इसी लालच के कारण मैं पैसेंजर गाड़ी से चलता हूं क्योंकि हमारे जैसे हल्की जेब वालों की जेब भी ज्यादा हल्की नहीं होती है। हर वैरायटी के लोगों से आमना-ंउचयसामना होता है। टेªन कुछ ही दूर चली होगी परन्तु संध्या से रात्रि हो गयी यद्यपि इसी बीच मैंने टेªन में कई घण्टे बिताये। रात्रि के थोड़े से अंधेरे में कहीं-ंउचयकहीं बल्व भी टिमटिमाने लगे थे। कहीं-ंउचयकहीं बल्वों के टिमटिमाने से लग रहा था कि देश में अभी भी बिजली, घर-ंउचयघर सिर्फ फाइलों में ही पहुंची है। वाइल्ड वैस्ट के डर के कारण मैं अपनी सीट पर चुपचाप बैठा था। मेरठ से पहले तक देैनिक यात्रियों के कारण, यात्री उतरते ज्यादा थे, च-सजय़ते कम थे। आती-ंउचयजाती लड़कियों, महिलाओं पर सीटी बजाना, फिकरे कसना यहां एक राष्ट्रीय पर्व के समान है। सभी देखते हैं, ज्यादातर करते हैं। शायद थकान और तनाव दूर करने का कोई मुक्त का लुकमान हकीम का नुस्खा हो। यहां तक कि पुलिस के जवान भी सुनकर अनसुना करते हैं। शायद पुरूषों का यह मानव अधिकार है और महिलाओं के नारित्व का अभिन्न हिस्सा है। मेरठ के पास के किसी स्टेशन से अधेड़ उम्र का एक जोड़ा ट्रेन में च-सजय़ा, दोनों के चेहरे मुर-हजयाये हुये थे तथा शरीर सूख कर -सजय़ांचे के समान ही रह गया था जैसे मक्का के खेत में परिन्दों को उड़ाने के लिए डण्डों पर कपड़े टांग रखे हों। अपने थैले आदि को संभालकर रखने के बाद चेहरों पर कुछ शांत भाव आये जैसे किसी गंभीर सुनामी से बचकर सकुशल निकल आये हों। एक पोलीथिन के थैले में कुछ राख तथा फटे कागज देखकर बहुत अजीब लगा कि ये क्या ले जा रहे हैंं? क्यों ले जा रहे हैं? कहां ले जा रहे हैंं? मेरे मन में पोलीथिन के थैले का रहस्य जानने की जिज्ञासा बेकाबू होती जा रही थी तथा मैं अपने को रोकने में एकदम असमर्थ पा रहा था। अन्त में मेरे अंदर की जिज्ञासा ने मेरे धैर्य और -िहजय-हजयक को पीछे छोड़ दिया और मैंने बिना किसी परिचय एवं -िहजय-हजयक के एक द्रोण प्रक्षेपात्र की तरह अपने प्रश्न का गोला फोड़ दिया। भाई साहब इस पोलीथिन के थैले में क्या ले जा रहे हैं? मेरे इस प्रश्न को सुनकर दोनों ने चौंककर एक लम्बी दर्दभरी साँस ली। इसके बाद महिला ने प्रश्नभरी आंखों से अपने पति की ओर देखा। जैसे वह कह रही हो आप ही कहानी के वाचक बन जायें। पति देव ने फिर एक लम्बी साँस ली तथा जिस तरह बेताल पेड़ से उतरकर कहानी सुनने के लिए राजा विक्रमादित्य के कंधे पर लटक जाता है ठीक उसी तरह मैं भी उचककर उसकी बगल में जा बैठा। एक थके हारे यात्री की तरह वर्मा साहब यानि कि पतिदेव ने आप बीती कहानी सुनानी प्रारम्भ की। वर्मा साहब पेशे से शिक्षक थे तथा उनकी पत्नी श्रीमति अल्पना वर्मा भी कहीं शिक्षक थी। दोनों गंगा-ंउचययमुना के दोआब के क्षेत्र में अंधेर नगरी चौपट राज्य विश्वविद्यालय से सम्बन्धित महाविद्यालयों में शिक्षक थे। दोआब का क्षेत्र पहले किसान, जवान, दूध के लिए सुप्रसिद्ध था परन्तु आधुनिक ग्लोबल एवं सैकुलर भारत मंें यह क्षेत्र अपराध, अपहरण, पशु वध , भूमाफिया, शिक्षा माफिया आदि काले धंधों के लिए कुख्यात हो गया है। ऐसे ही शोध माफिया के चंगुल से सकुशल बचने की खुशी में ये दंपत्ति तीर्थ यात्रा पर जा रहा था। वर्मा साहब ने आगे बोलना प्रारम्भ किया-ंउचय मई माह का समय था। चारों तरफ तमतमाती धूप की गर्मी से धरती बुरी तरह से -हजयुलस रही थी। गर्मी को भगाने के लिए मैं अपनी पत्नी अल्पना वर्मा के साथ ठंडी-ंउचयठंडी नींबू की शिकंजी का मजा ले रहा था कि अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी। मोबाइल के बजने के साथ हमारे दिलों की धड़कनें और ब-सजय़ जाती है क्योंकि हम जैसे सीधे-ंउचयसाधे शिक्षकों के मोबाइल बजने का अर्थ होता है कि कोई उनके उत्पीड़न एवं शोषण का षडयंत्र कर रहा है। नेता, अधिकारी, व्यापारी एवं शिक्षा माफिया तो मोबाइल के बजते ही दीपावली की लक्ष्मी माता के स्वागत के लिए, उसको सुनने के लिए लपकते हैं परन्तु हम लोग एक अनचाहे खतरे की आशंका से, कंपकपाते हाथों से उसका रिसिविंग बटन दबाते हैं। मई-ंउचयजून माह में शिक्षा माफिया वैसे भी ज्यादा ही सक्रिय हो जाते हैं। फोन रिसिव करने पर उधर से मेरे चार दशक पुराने मित्र डाक्टर संजय वर्मा की आवाज आई। आवाज पहचान होने पर कुछ सांस में सांस आई। कुशल क्षेम के आदान-ंउचयप्रदान के बाद काम की बात प्रारम्भ हुई। डाक्टर संजय वर्मा स्वयं एक वरिष्ठ रीडर हैं। उन्होंने बताया कि उनके एक अत्यन्त पुराने परिचित हैं जो अत्यन्त प्रतिश्ष्ठिित शिक्षाविद हैं। वर्तमान में शिक्षाविद की उपस्थिति, सहसा कानों पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि आज यह एक दुलर्भ प्रजाति हो गई है क्योंकि अब शिक्षा माफिया और शिक्षा के दलाल बहुतायात मंें मिलने वाले प्राणी हैं। अंधेरनगरी चौपट राज्य विश्वविद्यालय तो ऐसे दलालों के लिए एकदम कुख्यात है जहां वे भरे पड़े हैं। उत्तर-ंउचयभारत से ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत से भी डा0 राधाकृष्णन, प्रोफेसर कोठारी, प्रोफेसर -हजया, प्रोफेसर देव, प्रोफेसर फिराक आदि के साथ ही यह प्रजाति लुप्त होकर दुलर्भ प्रजाति बन गई। खैर वास्तविकता जो भी रही हो डाक्टर संजय वर्मा के मित्र डाक्टर डी0एस0 वर्मा किसी महाविद्यालय मंें विज्ञान के रिटायर्ड रीडर थे जो कि बातचीत में शिक्षा के रीडर कम, बिजली के मीटर रीडर ज्यादा लग रहे थे। डींग मारने मंें उनका कोई जवाब न था। आते ही हमें ज्ञान हो गया कि वो पी0एच0डी0 छापने में अर्धशतक बना चुके हैं तथा रिसर्च पेपर छापने में शतक बना चुके हैं। उनके लिए छापना इसलिए उचित है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या मंें शोध कराना तथा शोध पत्र लिखना एकदम असंभव है कोई सिर्फ चोरी, फर्जीवाड़ा करके ही संख्या इतनी कर सकता है। उनके इस प्रताप को देखकर हम उनसे मिलने में घबरा रहे थे तथा उनके अनेक आग्रहों पर हम उनसे मना ही करते रहे तथा मेरी धर्मपत्नी ने तो एकदम मना ही कर दिया क्योंकि आज के पी0एच0डी0 में अर्धशतक एवं शोध पत्रों में शतक वीरांे से मिलना किसी अंडरवर्ल्ड के माफिया डान से मिलने से कम नहीं तथा मधुमक्खी के छत्ते मेें हाथ डालने के समान है। मिलने से मना करने पर भी डाक्टर संजय वर्मा एवं डाक्टर डी0एस0 वर्मा ने टेलीफोन की -हजयड़ी लगा दी तथा दोनो ने हमारा जीना हराम कर दिया। हारकर धर्मपत्नी जी ने रिसर्च एवं शोध पत्र शतकवीर डाक्टर डी0एस0 वर्मा को मिलने का समय दे दिया। विनाशकाले विपरीत बुद्धि। हमने सोचा कि दोनों मिलकर इस आई बला को प्रणाम कर शान्त कर देंगे। मिलने के लिए हामी भरते ही वर्मा जी मिसाइल की सी तेजी से घर के दरवाजे पर धमक पड़े। डाक्टर डी0एस0 वर्मा को इतनी शीघ्र दरवाजे पर खड़ा देख दिल और दिमाग में किसी अनहोैनी की आशंका उत्पन्न हुई। वर्मा साहब सत्तर वर्ष के आसपास के ही होंगे। बातों में इतने चतुर थे कि चतुराई भी पीछे रह जाये। ऐसे चतुर एवं होनहार खिलाड़ी का हमारे अन्दर इतनी रूचि लेना, वह भी शोध जैसे गंभीर एवं मंहगे कार्य में बहुत अटपटा सा लग रहा था। जहां शोध मंें लाखों के वारे-ंउचयन्यारे हो रहे हों तथा शोध के लादेन ओैर तेलगी हर गली मौहल्ले में अपनी दुकान सजाये बैठे हों, वहां वर्मा जी जैसे महान शोध शतक वीर का इस शोध कार्य के लिए इस अनुभवहीन शिक्षिका के घर चक्कर लगाना, हमको अचंम्भित (स्तब्ध) कर रहा था। यहां तो शोध मंडी के बाजार भाव, जोड तोड़, काट-ंउचयपीट का कोई अनुभव ही नहीं था। शायद वर्मा जी को हमारा यही फक्कड़पना वरदान लगा जहां लाखों का फर्जीवाड़ा मुफ्त मंें ही हो जायेगा तथा अनुभवहीनता के कारण अर्धशतकों तथा शतकों के रिकार्ड के धोखाधड़ी का भी दबदबा बना रहेगा। हमारे घर आते ही डाक्टर डी0एम0 वर्मा ने अपनी बातों के तीर से हमले करने प्रारम्भ कर दिये। इसके बाद अपने शोध के अर्धशतक तथा शतकों का खुलकर वर्णन किया। इसके बाद अपनी पुत्री के टापर होने का खुलकर वर्णन किया तथा यह भी बताने से नहीं चूके कि नेट अथवा पी0एच0डी0 के बिना ही उन्होंने अपने ऊँचे सम्बन्धों के चलते सिर्फ एम0 ए0 पास अपनी पुत्री को डिग्री कालेज में प्रवक्ता बनवा डाला था। इस बात को हम दोनों पति-ंउचयपत्नी आज तक नहीं पचा पाये कि सिर्फ एम0ए0पास डिग्री कालेज में प्रवक्ता किस प्रकार हो सकती है। डाक्टर साहब ने अपनी डींग मे एक और पेैंग ब-सजय़ा दी और बोले कि उन्होंने अपनी लड़की से प्रवक्ता का पद छु़ड़वा दिया और कुछ समय बाद ही उनकी बेटी श्रीमति पंगु वर्मा ने पद से भी त्याग पत्र दे दिया। इससे हमारे अंदर हीनता का भाव जागृत हो गया कि हम दोनांें पति-ंउचयपत्नी उसी नौकरी को (प्रवक्ता) को कर रहे हैं जिसको उनकी बेटी ने पलक -हजयपकने के साथ ही पा लिया और एक ही पल में छोड़ दिया। अन्त में डाक्टर डी0एस0 वर्मा ने अपना ट्रंप कार्ड छोड़ा कि उनके दामाद जज हैं इस कारण दुनियां का हर कार्य पलक -हजयपकते ही करने में पूर्ण सक्षम हैं। डाक्टर डी0एस0 वर्मा की कटु बातों से प्रभावित होने के स्थान पर, हम उनसे सशंकित होते चले गये तथा मेरी सीधी-ंउचयसादी धर्मपत्नी ने इस नटवर लाल डाक्टर की पुत्री का शोध गाइड बनने में असमर्थता दिखाते हुए,डाक्टर साहब को प्रणाम कर राहत की सांस ली। परन्तु डाक्टर डी0एस0 वर्मा उछाड़-ंउचयपछाड़ के इस खेल के एक मंजे हुए डान थे। वे इस सम्मानपूर्ण विदाई्र से और ज्यादा उत्साहित होकर दुगुनी शक्ति से फोन पर फोन करने लगे। इतना ही नहीं उन्होंने अपने मित्र डाक्टर संजय वर्मा से भी अपनी खूबियों की बाबत भी निरंतर फोन करवाये। खूबियां बताते हुए एक दिन डाक्टर संजय वर्मा स्वयं यह बता गये कि डाक्टर डी0एम0 वर्मा शोध कार्यो पर हस्ताक्षर मात्र करते हैं तथा उसके लिए अच्छी खासी फिरौती की राशि की तरह, पर्याप्त धनराशि वसूलते हैं। उनकी इस कलाकारी से आप भी आगे लाभान्वित हो सकते हैं। डाक्टर संजय वर्मा ने हमें गंभीर सलाह दी। एक अन्य सिफारिशी फोन से हमें ज्ञात हुआ कि डाक्टर साहब दाखिले के रैकेट से भी जुड़े हुए हैं तथा पिछले दरवाजे से घटी दरों पर दाखिले कराने में भी सक्षम हैं। हार थककर हम भी अपनी लाभ-ंउचयहानि -सजयूं-सजय़ने लगे क्योंकि ना-ंउचयनुकर करने का मतलब है कि इतने सारे शक्तिशाली लोगों के बुरे बनना तथा शत्रुता मोल लेकर, अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए एक खतरा मोल लेने के बराबर है। सोचा कि जब सारा देश जाति के आधार पर चल रहा है दाखिले, नौकरी, प्रमोशन, चुनाव, टैण्डर, लोन, वजीफा, जनगणना, आयोग, सैलेक्शन कमेटी, राजनैतिक दल आदि सभी जातिगत आधार पर ही कार्य कर रहे हैं तो हम भी क्यों न अपने-ंउचयअपने वर्मा बन्धुओं के लिए कुछ करें चाहे वे अयोग्य ही क्यांें न हों? दूसरा यह सोचना कि डाक्टर डी0एम0 वर्मा, शोध के खेल के पहुंचे हुऐ खिलाड़ी हैं तथा उनकी पुत्री टापर है, दामाद जज हैं, पहंुच इतनी अधिक ऊँची है कि एम0ए0 पास को ही स्थायी रूप से प्रवक्ता बनवाकर त्याग पत्र भी दिलवा दिया। हम तो क्या उनके जज दामाद भी उनकी इस कला से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा दर्जनों बार उनके इस सलेक्शन एवं त्याग पत्र के खेल का प्रसारण कर चुके थे। इससे हमने भी सोचा कि बिना कुछ किये डाक्टर अल्पना वर्मा का भी शोध मंें खाता खुल जायेगा तथा उनके नाम से भ एक पी0एच0डी0 छप जायेगी। इतना सब होने के बाद मेरी धर्मपत्नी डाक्टर अल्पना वर्मा, डाक्टर डी0एस0 वर्मा की पुत्री श्रीमति पंगु वर्मा की पी0एच0डी0 डिग्री हेतु गाइड बनने के लिए हामी भर दी। हाँ कहते ही डाक्टर साहब के शरीर मंें बिजली की सी लहर दौड़ गई। अगले ही दिन डाक्टर डी0एस0 वर्मा साहब की पुत्री श्रीमती पंगु वर्मा अपने जज पति श्री के0पी0 वर्मा के साथ आई। जज साहब पचास वर्ष के आसपास के सामान्य व्यक्ति लग रहे थे परन्तु उनकी पत्नी पूर्णरूप् से जज साहिबा लग रही थी। हमारे देश मंें यह प्रथा सैकड़ों वर्षो से चलती आ रही है कि पति का ओहदा उसकी पत्नी को बगैर कुछ किये अपने आप ही मिल जाता है। यह प्रथा मुगल काल में काफी प्रचलित रही। अंग्रेजों के शासन में भी इसी नारी सशक्तिकरण को अपनाया गया तथा स्वतँत्र भारत में भी भारतीय नौकरशाही ने इसी परम्परा का अनुसरण किया परन्तु स्वतँत्र भारत में इस परम्परा ने एक शक्ति का रूप ले लिया तथा नारी अपने पति के ओहदे से भी ज्यादा सबल होकर भारतीय नौकरशाही के सशक्त स्तम्भ के रूप में उभरकर सामने आई। श्रीमति पंगु वर्मा नारी सशक्तिकरण का यही उदाहरण था। जज साहिबा दूरदर्शन की प्रसिद्ध हास्य कलाकार कु0 भारती की बड़ी बहन लग रही थी। प-सजय़ाई-ंउचयलिखाई से दूर-ंउचयदूर तक कोई सरोकार नहीं था सिर्फ पिता तथा पति के उछाड़-ंउचयपछाड़ के खेल में महारथ ने उनको एक अत्यन्त खाती-ंउचयपीती सशक्त नारी बना था तथा साकार नारी सशक्तिकरण की एक जीती-ंउचयजागती मिसाल बन गई थी। कहानी सुनाते-ंउचयसुनाते वर्मा साहब यानि पतिदेव कुछ थक गये थे तथा अपने उत्पीड़न को याद करके तनावपूर्ण हो जाते थे। आराम के लिए तथा ध्यान बंटाने के लिए मैंने तीन चाय का आर्डर किया। चाय पीने के पश्चात वर्मा साहब ने आप बीती कहानी फिर से सुनानी आरम्भ की। हामी भरते ही पिता-ंउचयपुत्री की इस जोड़ी ने तेज रफ्तार से इधर-ंउचयउधर से सामग्री उठानी प्रारम्भ कर दी कि कहीं यह फंसी चिड़िया हाथ से न चली जाये। दो दिन बाद शोध कार्य की रूपरेखा तैयार होकर सामने आ गई। जब धर्मपत्नी ने कुछ अपने सु-हजयाव एवं संशोधन दिये तो श्रीमति पंगु वर्मा का बेवाक जवाब था कि पापा इस मामले मंें तेज गति से कार्य कर रहे है, आपको चिन्ता की कोई आवश्यकता ही नहीं हैं। इंदिरा गांधी एवं पं0-ंउचयनेहरू की पिता-ंउचयपुत्री की जोड़ी के बाद शायद वर्मा परिवार की यह पिता-ंउचयपुत्री की जोड़ी भारत के पिता पुत्रियों की जोड़ी मंें शायद दूसरी जोड़ी रही होगी जो विद्वता के मामले में अमरत्व प्राप्ति की ओर अग्रसर थी। वर्मा परिवार की विद्वान पिता-ंउचयपुत्री की इस जोड़ी को सम्मान देते हुए धर्मपत्नी डा0 अल्पना वर्मा ने रूपरेखा को अपने किसी सु-हजयाव एवं संशोधन के समाहित हुए बिना ही शोध विकास समिति में रखने की उनकी बात पर अपनी स्वीकृति दे दी। निर्धारित तिथि को शोध विकास समिति की मीटिंग में, जिसमें धर्मपत्नी स्वयं भी एक सदस्या थी, जब श्रीमति पंगु वर्मा की उपस्थिति हुई तो उस शोध रूप रेखा पर साक्षात्कार मंें उनका प्रदर्शन एकदम निराशाजनक रहा तथा भाषा में भारी खामियां पाई गई। रूपरेखा में शायद ही कोई वाक्य सही लिखा होगा जिस कारण शोध रूपरेखा अस्वीकार कर दिया कर दिया गया। इस अस्वीकार्यता पर धर्मपत्नी काफी विचलित रहीं । अंग्रेजी भाषा तो ऐसी जैसे कि वह इंग्लिश न होकर कोई नई भाषा हिंगलिश हो गई हो। इस असफलता के बाद भी पिता-ंउचयपुत्री के दम्भ मंें कोई कमी नहीं आई। यह रूपरेखा कहीं से उड़ाई गई लग रही थी परन्तु वह भी एकदम गलत। इस नाकामयाबी के बाद पिता-ंउचयपुत्री की नकारा जोड़ी को सम-हजयने में डा0 अल्पना वर्मा एकदम असफल रहीं। बड़ी ही मुश्किल से गाइड महोदया ने उनकी गड़बड़ -हजयाला प्रारूप को ठीकठाक किया तथा फिर जोड़-ंउचयतोड़ के माहिर खिलाड़ी डा0 डी0एस0 वर्मा ने अपनी पुत्री के शोध के प्रारूप को पास भी करवा लिया। इसके बाद श्रीमति पंगु वर्मा ने एक-ंउचयदो बार गाइड के घर को अपने कदमों से अनुग्रहित किया। प-सजय़ाई-ंउचयलिखाई से उनका दूर-ंउचयदूर का वास्ता नही रहा। काला अक्षर भैंस बराबर की तरह उपाधि पर उपाधि इकट्ठी करे जा रही थी। जज साहब एवं डाक्टर साहब डींग मारने में इतने आगे ब-सजय़े हुए थे कि शायद डींग भी स्वयं अपने आप में लज्जित र्हो जाये। इस अयोग्य पुत्री का स्थायी प्रवक्ता के पद से त्याग पत्र दिलवाना, जज साहब द्वारा न्यायिक परीक्षा पास करना, डाक्टर साहब का शोध मंें अर्धशतक, शोध पत्रांें में शतक आदि-ंउचयआदि, एक चालू पांचों वक्त के नमाजी मुल्ला की तरह हर बार सुनने को मिलता था। इतना ही नहीं जज साहब का अपने सम्बन्धों के बल पर यह भी दावा था कि वह अपनी पत्नी श्रीमति पंगु वर्मा को भी हर हाल में जज बनवा देंगे। इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी का कहीं बार में न्यूनतम अर्हता पूरी करने के लिए औपचारिकता के लिए पंजीकरण भी करवा रखा था। अब तक हमें यह ज्ञान अवश्य हो गया था कि डाक्टर डी0एस0 वर्मा एक -हजयोलाछाप फर्जी डाक्टर थे। प-सजय़ाई-ंउचयलिखाई से दूर-ंउचयदूर तक कोई लेना-ंउचयदेना नहीं था। हमारे आवास के दो-ंउचयतीन चक्कर लगाने के बाद पुत्री तो इस शोध के फर्जीवाडे़ से एकदम गायब हो गई। अपने महाविद्यालय की कभी भी उन्होंने शक्ल ही नहीं देखी पर उनके शोध घौटालों के खूसट पिता एवं पति गाइड महोदय के पास कहीं से अध्याय के बाद अध्याय उड़ाकर लाते रहे जिनका असली विषय से दूर-ंउचयदूर तक कोई वास्ता नहीं था। दोनों का शातिर दिमाग गाइड को बहकाने एवं डराने मंें ही लगा रहा। धर्मपत्नी गाइड उनसे बहकती रहीं और डरती रही। इस शोध कार्य की सबसे बड़ी काली सच्चाई यह थी कि शोधार्थी ने कोई सर्वे कार्य नहीं किया जबकि आठ सौ लोगों पर सर्वे करना था। सारे फर्जी आंकड़े शोध ग्रन्थ के लिए चुराये गये थे। शोध ग्रन्थ का इतनी बड़ा फर्जीवाड़ा देखकर हम दंग रह गये। यह सपनों में भी नहीं सोचा कि इस देश में ऐसा भी फर्जीवाड़ा होता है। एक के बाद एक फर्जी अध्यायों पर पिता-ंउचयपुत्री-ंउचयपति के तिकड़ी डरा-ंउचयधमकाकर तथा दबाव डालकर हस्ताक्षर कराती रही। एक दिन यह तिकड़ी पूरे बाहुबल के साथ एकदम नये बंधे-ंउचयबंधाये शोध ग्रन्थ की पांच कापियों के साथ आ धमके। फर्जी-ंउचयनकल के इस शोध ग्रन्थ को लेकर इस तिकड़ी ने अन्य दो लोगों के साथ आकर हम दोनों को एक तरह से बंधक बना लिया। उस दिन जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाने के लिए तीनों ने अभद्रता की सारी हदें पारकर दीं। धमकाना, गाली गलौज, -हजयूठे केसों में फंसाने की धमकी, पिटाई की धमकी आदि-ंउचयआदि। हम दोनों उनसे इतने भयभीत हो गये कि धर्मपत्नी ने हस्ताक्षर करने में ही अपनी भलाई सम-हजयी। इतना कहकर वर्मा दंपत्ति के चेहरे पर पसीना -हजयलक आया। उस दिन को याद करके दोनों के चेहरे पर आज भी घबराहट देखी जा सकती है। इस धींगामुश्ती के बाद यह तिकड़ी कुछ दिन चुपचाप रही परन्तु कुछ दिन बाद इस तिकड़ी ने फिर अपने हट्टे-ंउचयकट्टे साथियों के साथ हमारे गरीबखाने के चक्कर काटने प्रारम्भ कर दिये। उनके दम खम से ऐसा लगता था कि जैसे हमारे गरीबखाने के, उनके भय के कारण खिड़की दरवाजे हिलने लगते हों। हमें वहां से घर छोड़कर भागना पड़े। अब वह डाक्टर अल्पना वर्मा पर दबाव डाल रहे थे कि शोध ग्रन्थ जमा होने से पूर्व होने वाले ’प्रि सबमिशन सेमिनार’ को बिना कराये ही उसका प्रमाण पत्र दे दें। उनकी धमकियों ओैर दबाव के चलते अनेक बार हमे घर के अन्दर ही छिपना पड़ जाता था। धमकीभरे फोन आना तो एक आम बात हो गई थी। विश्व विद्यालय के उप-ंउचयकुलपति प्रोफेसर कुनेजा, डीन प्रोफेसर मक्कार वाल, उप डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा आदि के दबाव भरे फोन आना आम बात हो गई थी। इसके साथ ही साथ -हजयूठे एवं मनग-सजय़ंत आरोपों का भी दौर प्रारम्भ हो चुका था। अंधेर नगरी चौपट राज। चोर का साथी चोर। इस चोर तिकड़ी को विश्वविद्यालय प्रशासन से भरपूर सहयोग की प्राप्ति हो रही थी। शोध छात्रा पंगु वर्मा ने शोषण के इतने आरोपों का घड़ा फोड़ना प्रारम्भ किया कि शायद कार्ल माकर््स भी अपने कब्र में लेटा उठ बैठे। यहां तक कि आधी रात के आसपास जज साहब भी महिला कालेज के चककर लगाते थे तथा -हजयूठी सच्ची शिकायतें प्राचार्या से जाकर किया करते थे। अन्त में इस फर्जी शोध कार्य का जमापूर्व सेमिनार कराने के लिए प्राचार्या एवं गाइड पर दबावभरे फोन विश्वविद्यालय से आने लगे। विश्वविद्यालय का एक पत्र तो खुले लिफाफे में जज साहब स्वयं लेकर गाइड महोदय के घर आये। इस सम्पूर्ण नाटक से विश्वविद्यालय भी काफी प्रभावित हुआ तथा उप-ंउचय कुलपति प्रोफेसर कुनेजा, डीन प्रोफेसर मक्कारवाल, उप डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा सभी ने मिलकर प्रि-ंउचयसबमिशन सेमिनार की औपचारिकताएं पूर्ण करवा दी। इसमंें श्रीमति पंगु वर्मा ने टूटी-ंउचयफूटी अंग्रेजी में दो-ंउचयचार पृष्ठ प-सजय़ दिये। इससे इतिश्री हो गई। जब कोई भी प्रश्न पूछता तो प्रोफेसर मक्कारवाल एवं सहायक डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा एकदम उग्र होकर हमला कर देते। इस फर्जी वाड़े का कोई भी प्रमाण न रहे इस कारण कोई सीडी अथवा रिकार्डिग भी नहीं की गई। इतना ही नहीं जब फाइनल रिपोर्ट लिखी जा रही थी तो श्रीमति पंगु वर्मा के जज पति एवं -हजयोलाछाप डाक्टर पिता डीन के साथ में बैठे हुए थे। इस फर्जी वाडे़ के बाद कब और कैसे शोध गं्रथ जमा हो गया गाइड महोदय को कुछ भी आभास नहीं हुआ। श्रीमति पंगु वर्मा के शोध गं्रथ जमा होने का पता जब चला जब फिर से सहायक डीन प्रोफेसर दुर्जना वर्मा ने मनपसंद परीक्षकों के नाम भेजने के लिए दबाव बनाने का फिर से एक नया ड्रामा प्रारंभ कर दिया। धर्मपत्नी फिर सकते में थी कि उनके हस्ताक्षर के बिना ही वह ग्रंथ भी जमा हो गया। शायद उनके किसी पुराने हस्ताक्षर के साथ छेड़छाड़ करके जमा करने में उपयोग कर लिया गया होगा। इतनी बड़ी कहानी सुनाकर वर्मा साहब ने फिर से लंबी सांस ली और बोले कि अंधेर नगरी चोैपट राज विश्वविद्यालय की महान दास्तान। कुछ देर रूककर वर्मा साहब ने फिर से बोलना प्रारम्भ किया। इस तिकड़ी के संबंधों के जाल का यह हाल था कि घर बैठे ही श्रीमति पंगु वर्मा को विश्वविद्यालय एवं देश के कौने-ंउचयकौने से सेमिनार/कांफ्रेस में शोध पत्र प्रस्तुत करने के प्रमाण पत्रों की लाइन लगा दी। दर्जनों प्रमाण पत्र उनकी फाइल में भरे रहते थे। रिसर्च जनरल भी ऐसे थे कि शायद ही किसी ने उनका नाम ही सुना हो। यहां तक कि प्रमाण पत्रों की भाषा भी एकदम अशुद्ध होती थी। एक बार इसी तरह का एक शोध पत्र प-सजय़ने का दु-ंउचयअवसर प्राप्त हुआ पत्र प-सजय़ने उपरांत पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी। इस शतकवीर पिता तथा टापर बेटी का शायद ही कोई वाक्य सही होगा। इस प्रकार यह लगने लगा कि पिता तोे शायद शतक ही लगा पाये परन्तु उनकी टापर पुत्री सचिन तेंदुलकर के शतकों का भी रिकार्ड तोड़ डाले। इस देश में सभी कुछ धन्य है। धन्य हो शिक्षक पिता जो अपनी पुत्री को चोरी सिखा रहा है। धन्य हो जज पति जो अपनी पत्नी के फर्जी शोध ग्रंथ में कन्धे से कन्धा मिलाकर भाग दौड़ रहा है। सौ में नियानवे बेईमान फिर भी मेरा भारत महान। शायद इस परिवार ने चोरी का डी0एन0ए0 मंगवाकर अपने अन्दर च-सजय़वा रखा हो। एक ईमानदार सभ्य शिक्षिका की मदद करने वाला विश्वविद्यालय में अन्य कोई नहीं मिला अपितु इस बेईमान टिकड़ी की पूरा विश्वविद्यालय मदद कर रहा था। शोध ग्रंथ जमा होने के चार-ंउचयपांच दिन बाद एक दिन डाक्टर डी0एस0 वर्मा फिर से आ टपके। उन्हांेंने विश्वविद्यालय का एक बड़ा सा लिफाफा सामने लाकर रख दिया जिस पर अति गोपनीय लिखा था परन्तु लिफाफा खुला हुआ था। खुले लिफाफे मंें तीनों विशेषज्ञों की तीन रिपोर्ट रखी थी। मौखिक परीक्षक का नाम व पता एक अन्य फार्म पर लिखा हुआ था। हम दोनों फिर सकते में थे कि ये क्या हो रहा है? अति गोपनीय नाम व रिपोर्ट खुले लिफाफे मे घूम रही है। परीक्षक का नाम शोधार्थी के पिता लेकर घूम रहे थे। ये सभी पत्र एवं पेपर उनके पास किस प्रकार पहुंच गये? इतने बड़े शिक्षा के महाबली डान को देखकर डाक्टर अल्पना वर्मा कुछ भी बोल नहीं पा रही थीं तथा वे एकदम हक्की -ंउचयबक्की रह गई। चार पांच दिनों में तीन-ंउचयतीन रिपोर्ट कैसे आई? चार-ंउचयपांच दिनों में तो इस देश में कहीं डाक भी नहीं पहुंचती। तीनों रिपोर्ट प-सजय़ने उपरान्त ऐसा लग रहा था कि जैसे डा0 डी0एस0 वर्मा ने तीनों रिपोर्ट स्वयं अपने आप से लिखकर विश्वविद्यालय में जमा कर दी हों। डाक्टर डी0 एस0 वर्मा की खानदानी शक्ति को सलाम करते हुए डाक्टर अल्पना वर्मा ने मौखिक परीक्षक को छः पत्र लिखे। वहां से कोई भी जवाब नहीं आया। शायद नाम-ंउचयपता ही फर्जी हो। फिर विश्वविद्यालय को भी अनेक पत्र लिखे गये परन्तु इस बार सुपरफास्ट विश्वविद्यालय से कभी कोई जवाब नहीं आया। फिर एक दिन डाक्टर डी0एस0 वर्मा स्वयं आ धमके। इस बार एक फार्म पर उन्होंने मौखिक परीक्षा के परीक्षक के हस्ताक्षर करवा रखे थे तथा डाक्टर अल्पना वर्मा से भी बिना मोैखिक परीक्षा के हस्ताक्षर करवाने के लिए दबाव डालने आ धमके परन्तु इस बार धर्म पत्नी ने अपना साहस दिखाया तथा उनके सब्र का सेतु टूट गया। उनके फर्जीवाड़े को लेकर उनको खूब खरी खौटी सुनाई। इस बार वह तिकड़ी भागती नजर आई। परन्तु कुछ समय बाद हमारी धर्म पत्नी को विश्वविद्यालय किसी कार्य से जाना पड़ा। वहां जाकर पता चला कि मौखिक परीक्षा पर डीन प्रोफेसर मक्कारवाला ने गाइड को अनुपस्थित दिखाते हुए मोैखिक परीक्षा के प्रपत्र पर हस्ताक्षर करके श्रीमति पंगु वर्मा को डाक्टरेट भी दिलवा दी। ईमानदार सभ्य लोगों के ग्रंथ दो-ंउचयदो वर्षो से जमा हैं उनकी सुध लेने वाला कोई भी नहीं है परन्तु इस नटवर लाल की पीएच0डी0 पन्द्रह दिवसों मंें ही एवार्ड हो गई। अब बजने वाली फोन की हर बजने वाली घंटी से यह इंतजार रहता है कि अब किसी दिन डाक्टर पंगु वर्मा जज अथवा महाविद्यालय में स्थायी प्रवक्ता बनने की अशुभ सूचना दें। कब प्रोफेसर डाक्टर मक्कारवाल एवं डाक्टर प्रोफेसर दुर्जना वर्मा कहीं उप-ंउचयकुलपति बनें। इतनी कहानी सुनकर वर्मा दंपत्ति कुछ समय तक आंख बंद करके बैठे रहे। कुछ समय बाद उनके चेहरे पर कुछ शांति दिखाई दी। इसके बाद वर्मा साहब ने पुनः बोलना प्रारम्भ कर दिया। पंगु वर्मा को पीएच0डी0 मिलने के बाद हमें भी मुक्ति मिल गई। अब इन चोरों के चोर बाजार से हमें भी छुट्टी मिल गई। शिक्षा एवं न्याय के मंदिर में विराजमान इन असुरों से हमारा पीछा एकदम छूट गया तथा अब हम खुली हवा में सांस लेने के लिए पूर्णरूप से स्वतँत्र हैं। हमने तुरन्त उनसे सम्बन्धित समस्त पत्रों को फाड़कर, जलाकर एक लिफाफो में भरकर, उनकी अस्थि मानकर पवित्र नदी मंें प्रवाह करने जा रहे हेैंं जिससे वे प्रेत बनकर हमारा पीछा न कर पायें। कहानी खत्म होते ही हम तीनों अपनी -ंउचयअपनी बर्थ पर जाकर सो गये। दिन निकलते ही ट्रेन हरिद्वार पहुंच गई। हरिद्वार पहुंचकर हम तीनों गंगा नदी के तट पर पहुंच गये। वर्मा दम्पत्ति ने वह लिफाफा नदी मंें प्रवाह कर दिया तथा जब तक उसे देखते रहे जब तक कि वह लहरों में आंखों से पूरी तरह ओ-हजयल न हो जाये। इसके बाद दोनों ने गंगा में स्नान किया तथा पड़ाव के अंतिम दौर में श्री हनुमान मंदिर मंें पहुंचकर भगवान को दण्डवत प्रणाम किया जैसे गा रहे होंः-ंउचय भूत पिशाच निकट नहीं आवे/महावीर जब नाम सुनावे/ संकट ते हनुमान छुड़ावें, मन क्रम वचन ध्यान जो लावें। (यह लघु कथा भ्रष्टाचार के ऊपर एक व्यंग्य मात्र है तथा स्थान, नाम, कहानी, सभी काल्पनिक हैं। किसी से किसी अंश की समानता मात्र संयोग होगा उसके लिए लेखक क्षमा प्रार्थी है तथा उसके लिए कोई उत्तरदायी नहीं है।)

Sunday, 15 August 2021

सिनेमा हाल--एक युग की समाप्ति

 एक समय हुआ करता था जब सिनेमाघर किसी भी शहर के विकास और स्तर का प्रतिबिम्ब हुआ करते थे। सिनेमाघर वाला इलाका नगर का सबसे प्रमुख और मंहगा इलाका हुआ करता था। उसके आसपास एक मिनी व्यवसायिक और आवासिय टाउनशिप बस् जाया करती थी जहां चौबीसों घंटे चहल-पहल रहती थी। वहाँ एक अलग दुनिया होती थी। यही हाल लगभग देश की राजधानी दिल्ली का भी कभी था। स्वाभिमान, स्वतंत्रता, और स्वावलंबन के सशक्त आधार पर सिनेमा घर व्यावसाय की बुनियाद तैयार हुई थी। 

 

दिल्ली में सिनेमाघरों का इतिहास बहुत पुराना है। रामपुरा में टिन के हाल में राजकमल सिनेमा चलता था जिसमें लकड़ी की लगभग सौ कुर्सियां बैठने के लिये होती थीं। मात्र आठ आने टिकट होती थी। दर्शक हाल के अंदर बीड़ी भी पीते रहते थे। ऐसा लगता था कि किसी गांव में बैठ कर पिक्चर देख रहे हों। पास ही सब्जी-मंडी रोड पर अम्बा सिनेमाघर थी जहां दिलीप कुमार-सायरा बानो की गोपी फिल्म महीनों चली थी।

 

दिल्ली शहर किसी समय में सिनेमाघर-थियेटरों का शहर होता था। शहर फैलता गया, आबादी बढ्ती गयी पर देखते-देखते कई सिनेमाघर बंद होते गएआज बदले नजरिये के कारण बड़े पर्दे खत्म होते जा रहें हैंवह सिनेमाघर जिनमें कई-कई महिनों तक हाउसफुल रहता था और जो शहर की लाइफ लाइन हुआ करते थे, आज वीरान पड़े हैं और उन पर ताले पड़े हैं। तालों पर भी जंग लग गयी है। कुछ सिनेमाघर को तोड़्कर दुकानें अथवा मार्केट बना दी गई हैं। आज उनकी पहचान भी खत्म हो रही है।

 

पुरानी दिल्ली की धड़्कन चांदनी चौक में एक समय चार सिनेमाघर थे और अब चारों बंद हो गए। गौरी शंकर मंदिर के सामने मोती सिनेमा था वह बंद हो गया है। 1970 में, मै अपने स्वर्गिय पिताजी के साथ एक बरात में चांदनी चौक दिल्ली आया था। तब हमको लड़्की वालों ने नवीन निश्छल और रेखा की 'सावन भादों'  इस सिनेमाघर में नौ से बारह वाले शो में रात्री में दिखाई थी। वहीं की कैंटीन में रात की दावत का भी प्रबंध किया गया था। आज किसी को अहसास भी नहीं कि वह पहचान भी खत्म होती जा रही है।

 

लगभग सौ मीटर आगे और एक चर्च से थोड़ा पहले कुमार टाकीज़ नामक एक और सिनेमाघर थावह भी बंद हो गया और उसमे अब मैकडोनल्ड रेस्तरा खुल गया है और कुछ  दुकानें खुल गई हैं। थोड़ी सी दूरी पर ऐतिहासिक शीश गंज गुरुद्वारे के सामने, फव्वारा चौक पर मैजेस्टिक सिनेमाघर था जो अब बंद हो गया । मजेदार बात यह है कि गुरुद्वारे ने ही सिनामाघर को खरीद लिया यानी अब सिनेमाघर से ज्यादा धनी गुरुद्वारे हैं और अब वहां एक सिधर्मशाला है।

 

थोड़ा आगे मुड़कर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन जाने वाली सड़्क पर लगभग एक फर्लांग की दूरी पर जुबली सिनेमाघर था। वह भी अब बंद हो गया। दूसरी तरफ फतहपुरी चौक से मुड़कर,  जो सड़्क पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से आज़ाद मार्केट की ओर जाती है वहां नॉवल्टी सिनेमाघर थावह भी अब बंद हो गया।

 

मै जब भी बचपन में दिल्ली आता था ये सब सिनेमाघर दर्शकों से खचाखच भरे रहते थे। सस्ती टिकट होने के कारण टिकट मिलना बहुत बड़ी बात होती थीं। एक शो पहले टिकट खरीद कर चांदनीचौक घुमने चले जाते थे। टिकट एक रुपए से प्रारम्भ होकर पांच से दस रूपए तक होती थी।

 

धीरे धीरे महंगाई के कारण टिकट महंगी होती गईं। पहले चांदनी चौक घूमने का मतलब होता था दिल्ली घूम आना। निम्न-मध्य वर्ग और मध्य वर्ग के लोग चांदनी चौक घूमने, चांट खाने और शॉपिंग करने जाते थे। कनॉट प्लेस सिर्फ उच्च-मध्य वर्ग और संभ्रांत वर्ग के लोग ही जाते थे।

 

तथाकथित कलाप्रेमी बेकार के कलाकारों तथा बेकार की कलाक्रतियों के लिये तो हायतोबा करते रहते हैं पर इतनी बड़ी संख्या में सिनेमाघरों के बंद होने पर भी गहरी नींद सोये हुये हैं। इतनी बड़ी गम्भीर समस्या पर कोई भी अपना मुँह भी नहीं खोल रहा है। सिनेमाघर व्यवसायिक प्रगति के साथ-साथ लोगों के विचारों की भी गतिशीलता का भी मानक होता है।

 

चांदनी चौक चांट और मिठाई के लिये भी बहुत प्रसिद्ध था। विग पूरी वाले के छोले भटूरे और और गर्मागर्म गुलाब जामुन की बड़ी सी दुकान, गौरी शंकर मंदिर और जैन मंदिर के सामने होती थी। अब वहां फूल वाले बैठते हैं। वह दुकान भी बंद हो चुकी है। वहीं पर ऐतिहासिक घंटे वाली मिठाई की दुकान होती थी। वह दुकान भी बंद हो चुकी है। टाउन हॉल के सामने कंचे वाली लेमन की बोतल पीने को मिलती थी। दरीबा के बाहर देसी घी की जलेबी की दुकान थी। सौभाग्य से कंचे वाली लेमन और देसी घी की जलेबी की दुकान आज भी है।

 

मेरे कालेज और विश्वविध्यालय के वरिष्ठ साथियों ने चांदनी चौक में कलकत्ता की तरह ट्राम को चलते देखा था जिसमें ड्राइवर पीतल का बड़ा घंटा बजाता चलता था । यह ट्राम चांदनी चौक से फतह पुरी की तरफ जाती थी। इसी तरह पुरानी सब्जी मण्डी और बर्फखाना के बीच भी ट्राम चलती थी। अंग्रेजों की इस देन को हम भारतीय चला नहीं पाये और साठ के दशक में इसे भी बंद कर दिया गया।

 

बंद होने का खेल यहीं नहीं रुका। पुलबंगश से आगे, फिल्मिस्तान सिनेमाघर था। जो काफी लंबे समय तक चलता रहा। पर अब बंद हो चुका है। इसी सड़्क पर अम्बा सिनेमा है जो किसी तरह अभी भी चल रहा है।

 

थोड़ा आगे रोशनारा रोड पर पैलेस सिनेमा था। जो अब बंद हो चुका है। 1951 में निर्मित इस सिनेमाघर का नवीनीकरण 1970 के आसपास हुआ और इसमें 70 एमएम का बड़ा स्क्रीन और आधुनिक साउंड सिस्टम लगाया गया। जनता पार्टी की सरकार के कार्यकाल में, जनवरी 1978 में, एक फिल्म फेस्टिवल हुआ था। तब दर्शकों में श्रीमति इन्दिरा गांधी इस सिनेमाघर में फिल्म को देखने आईं थीं। लोग पिक्चर छोड़ श्रीमति गांधी को देखने दौड़ पड़े। यह सिनेमाघर भी बंद पड़ा है।

 

नई दिल्ली स्टेशन के पास शीला सिनेमा है । नवीकरण के बाद उसमें 70 एमएम सिस्टम का बड़ा स्क्रीन लगाया गया। लिबर्टी सिनेमा, करोल बाग़ के पास आनंद पर्वत में अभी भी है। गोलचा सिनेमा, दरिया गंज और डिलाइट सिनेमा, आसफ अली रोड पर आज भी हैं और सौभाग्य से चल भी रहे हैं।

 

मिनर्वा सिनेमाघर, मोटर मार्केट, कश्मीरी गेट और रिट्ज सिनेमा, कश्मीरी गेट के मेट्रो स्टेशन के पास हुआ करते थे। यहां मैंने श्रिषि कपूर-डिम्पल कपाड़िया की 'बाबी' फिल्म देखी थी। दोनों सिनेमाघर अब बंद हो चुके हैं।

 

दिल्ली का सब्से सस्ता सिनेमाघर रॉबिन टॉकिज जो पुरानी दिल्ली में घंटाघर चौक से आगे बाज़ार में था। बैठ्ने के लिये बैंच होते थे। चार आने से एक रूपए के बीच टिकट होती थी।

लाइट चले जाने पर या फिल्म की रील कट जाने पर खूब शोर होता था । सीटियां बजती थीं। महिलायें और परिवार यहां बहुत कम आते थे। यहां भी मैंने फिल्म 'बेईमान' देखी थी। यह सिनेमाघर अपने हुल्लड़ के लिये जाना जाता था।

 

झन्डेवालान में 'नाज़' सिनेमाघर था । जो दिल्ली के सबसे पुराने सिनेमाघर में जाना जाता  था। इसके पीछे दिल्ली विश्वविद्यालय का भारती महिला कॉलेज था । इस थियेटर में विश्वविद्यालय की लड़कियां और उनके दोस्त भरे रहते थे । 1995 के आते-आते इस पर भी ताले पड़ गये। इमरजेंसी के बाद यहां पर ' आंधी ' फिल्म लम्बे समय तक चली थी। इसी तरह पहाड़गंज का 'खन्ना' सिनेमाघर शायद अभी तक चल रहा है

 

ये सभी सिनेमाघर आज़ादी से पहले अर्थात अंग्रेज़ो के ज़माने के थे। अंग्रेज़ो ने सिनेमाघररौं  और पिक्चरौं को खूब प्रोत्साहन दिया। सिनेमाघररौं से एक ओर जहां व्यापार और रोजगार  को बढ़ावा मिलता था वहीं सरकार की आय भी बढ़्ती थी तथा जनता को सस्ता मनोरंजन मिलता था। पर सरकारौं की अनदेखी और प्रशानिक भ्रष्टाचार ने सिनेमाघरौं पर ताले लट्का दिये तथा धीरे धीरे अधिकांश सिनेमाघर बंद हो गए।

 

आजादी के बाद बहुत कम नए सिनेमाघरौं का निर्माण हुआ। उनमें से एक पुरानी दिल्ली घंटा घर के पास अम्बा सिनेमाघर है, जो 70 के बाद बना। सौभाग्य से यह अभी भी चल रहा है। मॉडल टाउन में अल्पना सिनेमाघर 1967 के आसपास खुलादिल्ली विश्वविद्ध्यालया के पास होने के कारण इसमें छात्र-छात्रायें भरे रहते थे। अभिनेता राज्कुमार की फिल्म ' हमराज़' के प्रीमियर शो में अभिनेता राजकुमार खुद आये थे। भीड़ को कंट्रोल करने में पुलिस के पसीने छूट गये थे। यह अभी चल रहा है। मुखर्जी नगर में बत्रा सिनेमाघर बहुत बाद में खुला पर वह जल्द ही बंद हो गया। अशोक विहार में दीप सिनेमाघर बना जो खूब चलता था पर कुछ साल पहले इसमें भी ताले लटक गये और इसमें भी मार्केट, दुकानें और रेस्तरां खुल गये हैं।

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के नजदीक होने के कारण ये सारे सिनेमाघर ज़्यादातर भरे रहते थे। इनमें छात्र-छात्राओं की खूब भीड़ रहती मिलती थी। जो छात्र-छात्राऐं एकांत चाहते थे उनके लिये सिनेमा घर सबसे सस्ते और सुरक्क्षित स्थान होते थे। प्रेमी जोड़े भी सिनेमा घर में एकांतवास का आनंद लेते थे। परंतु कम लाभ, झंझट ज्यादा और सरकारों की उदासीनता के कारण, एक जमाने में शहर की धड़्कन कहे जाने वाले सिनेमाघर  एक के बाद एक सिनेमाघर बंद होते चले गये।

 

नई दिल्ली में सिनेमाघर व्यवसाय ज्यादा नहीं चल पाया। कनॉट प्लेस जो अब राजीव चौक हो चुका है में जहां व्यापारिक गतिविधियां दिन दुगनी रात चौगनी बढ रहीं हैं वहां का सबसे प्रमुख लैंड्मार्क रीगल सिनेमाघर बंद हो चुका है। बाकी सभी सिनेमाघर किसी तरह आज चल रहे हैं। रीगल सिनेमाघर के बंद होने पर दिल्ली की जनता को बहुत दुख हुआ था और बो काफी भावुक भी हो गए थे

 

प्लाजा, ऑडियन्, रिवोली, रीगल नई दिल्ली के दिल हुआ करते थे। मैंने इन सिनेमाघरौं में पत्थर और पायल, शोले, जुदाई, आराधना, शान आदि फिल्में अपने दोस्तों के साथ देखीं थी। दिल्ली के सभी सिनेमाघरों के आसपास टिकट ब्लैक का बहुत सुचारु धंधा खुलेआम चलता था। जब भी कोई नई अथवा अच्छी फिल्म आती थी तो ये लोग सक्रिय हो जाते थे और सिनेमाघर के बाहर, ऊंची कीमत पर धड़्ल्ले से टिकट बेचते थे।

 

दक्षिण दिल्ली के मनोरंजन का प्रमुख नाम साकेत स्थित उपहार सिनेमा अग्नि-कांड के बाद अदालतों की तारीखों में फंस कर हमेशा के लिये बंद हो गया। कुछ और भी सिनेमाघर हैं पर वे प्रसिद्ध नहीं हैं।

 

समय के साथ नए नए मॉल खुल गए हैं। पी वी आर, मल्टीप्लेक्स सिनेमा ने पुराने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर का स्थान ले लिया है। जिनमें कभी-कभी हर शो में अलग अलग फिल्में चलती है। टिकट भी बहुत महंगी होती है। कहीं-कहीं तो खाने पीने के पैकेज के साथ टिकट हज़ारों में भी होती है।

 

अब प्रश्न यह आता है कि पुराने सिनेमाघर क्यों बंद हो रहे हैं? इसका सही उत्तर है कि हिन्दी फिल्मों का वितरण अब एक डिस्ट्रिब्यूटर माफिया तथा अंडरवल्ड के हाथ में चला गया है और वह फिल्मों को बहुत ऊंचे रेट पर बेचता है। इस कीमत पर सस्ते सिनेमाघर लाभ नहीं कमा सक्ते। कुछ डिस्ट्रिब्यूटर तो दुबई और करांची से भी संचालित होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कश्मीर की तरह कहीं दिल्ली के भी सभी सिनेमा घर एक-एक कर सभी बंद हो जायेंगे।

 

दुसरे, दिल्ली में जमीनों के रेट बहुत ऊंचे होने के कारण इनमें दुकानें-मार्केट बना कर ऊंची कीमत पर बेच देने से ज़्यादा मुनाफा कम समय में मालिकों को मिल जाता है। सरकारों और प्रशासन ने भी इन्हें खूब निचौड़ा। इनके रखरखाव और तकनीक का खर्चा बढ़ गया है इस कारण इनके मालिक उस खर्च पर सिनेमाघर नहीं चला पा रहे हैं ।

 

आतंकवाद भी सिनेमा हाल के बंद होने का एक बड़ा कारण है। आज आतंकावाद के कारण मालिकों को सुरक्षा पर बहुत ध्यान देना पड़्ता है। खालिस्तान आतंकवाद और इस्लामिक आतंकवाद के कारण सुरक्षा पर बहुत खर्च आता है। इंटरनेट के आने से भी सिनेमा घर व्यवसाय उजड़ गया। पिछ्ले कुछ दशक में, य्ह व्यवसाय ठप्प होता चला गया। अधिक धन के लालच ने इस दुनिया को खत्म ही कर दिया। कला पर धन और मुनाफा हावी होता चला गया।

 

आज भी काफी लोग सिनेमाघर जाकर फिल्म देखना पसंद करते हैं। सिनेमा घर व्यवसाय स्वदेशी आंदोलन के समान है। कई सिनेमा हॉल तो तिहासिक महत्त्व भी रखते हैं, इनके बारे में सरकारौं को सोचना चाहिए और इन्हे पुन: शुरू करने का प्रय्त्न करना चाहिये। क्या कभी वो युग वापस आ सकता है। यह सवाल सभी के दिल में है।

 

सनंदर्भ:

1- दैनिक जागरण, नई-दिल्ली।

2- दि पायनियर, नई-दिल्ली।

3- दि टाइंम्स आफ़ इंडिया, नई-दिल्ली।

4- दि आब्जरवर, नई-दिल्ली।